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कैलाश की बर्फीली चोटियों पर जब माता पार्वती एकांत में थीं, तब उनके मन में एक ऐसे अपने की चाह जागी जो केवल उनका हो—जिसका अस्तित्व केवल उनके मातृत्व से जुड़ा हो। इसी अगाध मातृ-प्रेम में उन्होंने अपने शरीर पर लगे चंदन और हल्दी के उबटन को समेटा और अपने हाथों से एक सुंदर बालक की मूरत गढ़ दी। जब उस मूरत में माँ ने अपने प्राण फूंक दिए, तो कैलाश का कोना-कोना एक तेजस्वी बालक की हँसी से गूंज उठा। माँ ने स्नेह से बालक के माथे को चूमा और द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया: **"तात, जब तक मैं स्नान कर बाहर न आऊँ, किसी को भी भीतर मत आने देना।"** बालक के लिए माँ का यह पहला आदेश ही उसका संपूर्ण धर्म बन गया। वह हाथ में दंड लेकर द्वार पर अडिग खड़ा हो गया। तभी वहाँ स्वयं देवाधिदेव महादेव शिव पहुँचे। जब शिवजी भीतर जाने लगे, तो उस नन्हे बालक ने उनका मार्ग रोक लिया। शिवजी के गणों ने बालक को समझाने और डराने का प्रयास किया, किंतु जिसके भीतर स्वयं जगदंबा का अंश हो, वह भयभीत कैसे होता? उसने एक-एक करके सभी गणों को परास्त कर दिया। अंततः भगवान शिव और उस बालक के बीच भयंकर द्वंद्व छिड़ गया। बालक अपनी माता के वचनों की रक्षा के लिए बिना डरे साक्षात महाकाल के सामने डटा रहा। उसी अप्रतिम कर्तव्यबोध और क्रोध के क्षण में शिवजी के त्रिशूल ने बालक का शीश धड़ से अलग कर दिया। भीतर से जब माता पार्वती बाहर आईं, तो सामने अपने लाल का निष्प्राण शरीर देखकर उनका हृदय छिन्न-भिन्न हो गया। ममता का कोमल रूप देखते ही देखते महाकाली के संहारक रौद्र रूप में बदल गया। ब्रह्मांड कांपने लगा, तीनों लोकों में प्रलय की ज्वालाएं उठने लगीं। देवी ने स्पष्ट कर दिया कि यदि उनके पुत्र को जीवनदान नहीं मिला, तो सृष्टि का अंत निश्चित है। माँ की इस अथाह वेदना और प्रेम के आगे स्वयं महादेव झुक गए। उन्होंने तुरंत उत्तर दिशा की ओर दूत भेजे और ऐसे जीव का मस्तक लाने को कहा जिसकी माँ अपनी पीठ उसकी ओर करके सोई हो। देवदूत एक गजराज (हाथी) के शिशु का मस्तक लेकर लौटे। शिवजी ने मंत्रोच्चार के साथ वह गज-शीश बालक के धड़ से जोड़ दिया और उसमें नवजीवन का संचार किया। जब बालक ने आँखें खोलकर "माँ" पुकारा, तो पार्वती जी का वात्सल्य अश्रु बनकर बह निकला। महादेव ने न केवल उस बालक को अपनाया, बल्कि उसे अपने सभी गणों का स्वामी बनाकर **गणपति** नाम दिया और वरदान दिया: **"संसार में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले तुम्हारी पूजा होगी। तुम विघ्नहर्ता कहलाओगे।"** इस प्रकार माँ की ममता, निश्छल कर्तव्यनिष्ठा और शिव की असीम शक्ति के संगम से हमारे प्यारे गजानन का प्राकट्य हुआ, जो हर भक्त के हृदय में प्रथम स्थान रखते हैं।

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