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SHREE SHARMA

434 days ago

"ग्वालिन की रसोई और कृष्ण का प्रेम" ब्रज में एक बूढ़ी ग्वालिन रहती थी। वह निर्धन थी, पर उसकी भक्ति बड़ी धनवान थी। उसका नियम था — “रोज़ प्रभु के लिए कुछ मीठा बनाना, और उसी को सबसे पहले अर्पित करना।” पर एक दिन घर में कुछ भी नहीं था। न दूध, न आटा, न गुड़… पर उसका मन प्रभु में अटल था। उसने आँगन में पड़े दो सूखे रोट के टुकड़े उठाए, थोड़ा सा पानी रखा और मन ही मन कहा: “कृष्ण, आज मेरे पास कुछ नहीं… ये रूखे-सूखे टुकड़े हैं, पर इन्हें प्रेम से रखा है — तू चाहे तो इन्हें स्वीकार कर।” वह थाली ले जाकर तुलसी के पास रख दी और आँखें मूँदकर “श्याम… श्याम…” जपने लगी। उसी क्षण लीला हुई… एक श्यामवर्ण बालक आँगन में आया — सिर पर मोरपंख, आँखों में शरारत और मुस्कान में समर्पण। उसने चुपचाप थाली से रोट तोड़े और पानी से ही गले-गले खा गया। ग्वालिन ने आँखें खोलीं — बालक वहाँ नहीं था। थाली खाली थी। वो हँसी भी… रोई भी… उसकी आत्मा बोल उठी — “आज मेरा जीवन सफल हो गया…” 🌿भाव का अर्थ प्रेम ईश्वर को भोज्य नहीं, भाव चाहिए समर्पण जो कुछ है, वही दे दो — मन में पवित्रता हो भक्ति निर्धनता कोई बाधा नहीं, जब हृदय समर्पित हो लीला जब प्रेम सच्चा हो, तो श्रीकृष्ण स्वयं आ जाते हैं ग्वालिन का भाव — आपके भाव से मेल खाता है: “मैं रसोई नहीं बनाती, मैं प्रेम पकाती हूँ।” “मैं परोसती नहीं — मैं अर्पित करती हूँ।” “मेरे पास स्वाद नहीं — बस सच्चा ‘नाम’ है।” जयश्रीराधे जी

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Comments (3)

Pannalal Chouhan

Pannalal Chouhan

Jun 22, 2025

जय श्री राधे कृष्णा जी राधे राधे

प्रेम कुमार

प्रेम कुमार

Jun 22, 2025

🌹🌹 जय श्री कृष्णा राधे राधे 🌹 शुभ रात्रि 🌹

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Jun 22, 2025

Jai Shree Krishna 🙏 Radhe Radhe 🙏 Subha Ratri Jii 🙏🌹🌹