
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
36 days ago
प्रभु कृपा 🚩 🚩 राजा भरत और जड़ भरत की कथा (श्रीमद्भागवत महापुराण) राजा भरत, भगवान ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनके नाम पर ही इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा। वे अत्यंत धर्मात्मा, न्यायप्रिय और पराक्रमी राजा थे। कई वर्षों तक आदर्श शासन करने के बाद उन्होंने राज्य अपने पुत्रों को सौंप दिया और भगवान की भक्ति तथा तपस्या के लिए वन चले गए। वन में उनका मन पूरी तरह भगवान की आराधना में लगा रहता था। एक दिन उन्होंने एक गर्भवती हिरणी को नदी पार करते देखा। तभी सिंह की गर्जना सुनकर हिरणी भयभीत होकर नदी में कूद गई। उसने एक शावक को जन्म दिया, लेकिन स्वयं प्राण त्याग दिए। राजा भरत को उस अनाथ हिरण-शावक पर दया आ गई और वे उसकी देखभाल करने लगे। धीरे-धीरे उनका मन भगवान से हटकर हिरण में अधिक लग गया। वे हर समय उसी की चिंता करने लगे। अंत समय में भी उनका स्मरण भगवान के बजाय हिरण का ही था। इसलिए अगले जन्म में उन्हें हिरण का शरीर मिला। हालांकि, पूर्व जन्म की स्मृति उनके साथ बनी रही। उस जन्म में भी वे संतों के आश्रम के पास रहते और मन ही मन भगवान का स्मरण करते रहे। हिरण का शरीर छोड़ने के बाद उनका तीसरा जन्म एक विद्वान ब्राह्मण के घर हुआ। इस जन्म में उन्होंने निश्चय किया कि वे किसी भी सांसारिक मोह में नहीं पड़ेंगे। इसलिए वे संसार के सामने जड़, मूर्ख और उदासीन बने रहे। इसी कारण लोग उन्हें "जड़ भरत" कहने लगे। एक बार राजा रहूगण की पालकी उठाने के लिए उन्हें पकड़ लिया गया। जड़ भरत चलते समय रास्ते में छोटे जीवों को बचाने के लिए सावधानी से कदम रखते थे, जिससे पालकी डगमगाने लगी। राजा रहूगण ने उनका अपमान किया। तब जड़ भरत ने आत्मा और शरीर का गहरा ज्ञान देते हुए कहा कि शरीर ही थकता है, आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। उनके उपदेश से राजा रहूगण का अहंकार नष्ट हो गया और उन्होंने जड़ भरत से क्षमा माँगकर उन्हें अपना गुरु माना। कथा का संदेशः भगवान की भक्ति करते हुए भी किसी भी सांसारिक मोह से सावधान रहना चाहिए। अंतिम समय का स्मरण अगले जन्म को प्रभावित करता है। आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है। सच्चा ज्ञानी बाहरी रूप से साधारण दिख सकता है, इसलिए किसी का मूल्य केवल उसके बाहरी व्यवहार से नहीं आँकना चाहिए।

Comments (1)

kirti Dahiya
Jul 25, 2026
राधे कृष्णा जी 🙏
