
SHREE SHARMA
61 days ago
कृष्ण ही हैं धर्म भी, कृष्ण ही कर्तव्य हैं: संसार में 'धर्म' का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सही मार्ग पर चलना और नीति का पालन करना है। इस पंक्ति के अनुसार, श्रीकृष्ण स्वयं साक्षात धर्म का स्वरूप हैं। जीवन में हमारे जो भी कर्तव्य (कर्म) हैं, वे सब कृष्ण को समर्पित होने चाहिए। जब हम अपने हर कार्य को भगवान का कार्य मानकर करते हैं, तो हमारा कर्तव्य ही हमारी पूजा बन जाता है। कृष्ण ही हैं यात्रा, कृष्ण ही गंतव्य हैं: यह जीवन एक 'यात्रा' की तरह है और इस यात्रा में मिलने वाले सुख-दुख, उतार-चढ़ाव और साधना के मार्ग भी कृष्ण की ही लीला हैं। 'गंतव्य' का अर्थ है हमारी अंतिम मंजिल। आत्मा की अंतिम मंजिल परमात्मा में विलीन होना या मोक्ष प्राप्त करना है। इसलिए, जीवन के सफर की शुरुआत भी कृष्ण से होती है, पूरा सफर (यात्रा) भी उन्हीं की कृपा से तय होता है, और अंत में जहाँ हमें पहुँचना है (मंजिल), वह गंतव्य भी स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं।

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