
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
108 days ago
यह कथा भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी (किशोरी जी) के मध्य यमुना जी के तट पर घटित एक अत्यंत मधुर प्रेम लीला है। कथा की शुरुआत तब होती है जब श्री राधा रानी अपनी सखियों (ललिता, विशाखा आदि) के साथ यमुना पार दही और माखन बेचने जाती हैं। आमतौर पर श्री जी साथ नहीं जातीं, लेकिन उस दिन वे सखियों को सुख देने और श्याम सुंदर से मिलने की चाह में उनके साथ चल पड़ती हैं। दिन भर घूमने के बाद भी उनका दही नहीं बिकता और शाम घिरने लगती है। सखियां चिंतित हो जाती हैं क्योंकि उन्हें घर लौटने की जल्दी थी। जब वे यमुना के तट पर पहुँचती हैं, तो उन्हें वहां कोई नाविक नहीं मिलता। तभी श्रीकृष्ण, जो सदैव श्री जी की इच्छा पूरी करने के लिए तत्पर रहते हैं, एक छोटे से मल्लाह (नाविक) का वेश धारण कर अपनी छोटी सी नाव लेकर वहां प्रकट होते हैं। सखियां दूर से नाविक को पुकारती हैं, लेकिन कृष्ण अपनी लीला शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि वे कोई साधारण मल्लाह नहीं बल्कि 'नंद के छोरा' हैं और यह नाव उनके पिता ने उनके भ्रमण के लिए दी है, सवारियां ढोने के लिए नहीं। काफी मान-मनौव्वल के बाद, जब सखियां राधा रानी का नाम लेती हैं, तो कृष्ण तुरंत तैयार हो जाते हैं। वे शर्त रखते हैं कि नाव बहुत छोटी है, इसलिए केवल श्री जी ही बैठ पाएंगी। हालांकि, ललिता और विशाखा चतुराई से सभी सखियों को नाव में बिठा लेती हैं। नाव में बिठाने से पहले कृष्ण एक और लीला करते हैं। वे कहते हैं कि वे अपनी पवित्र नाव में श्री जी को ऐसे ही नहीं बैठने देंगे, पहले उनके चरण धोएंगे। वे बड़े प्रेम से राधा रानी के चरणों को धोते हैं और उस जल का आचमन करते हैं, जो भक्तों के लिए एक परम सौभाग्य का दृश्य है। जब नाव बीच मझधार में पहुँचती है, तो कृष्ण अपनी थकान का बहाना बनाकर पतवार रोक देते हैं। वे सखियों से कहते हैं कि उन्हें भूख लगी है। सखियां उन्हें माखन और दही खिलाने का प्रस्ताव देती हैं, लेकिन कृष्ण जिद करते हैं कि वे केवल श्री जी के 'गोरे-गोरे' कोमल हाथों से ही पाएंगे। विवश होकर और सखियों के आग्रह पर, राधा रानी अपने हाथों से कृष्ण को माखन खिलाती हैं। इसके बाद कृष्ण एक और शर्त रखते हैं कि उनका मन नहीं लग रहा है, इसलिए श्री जी को उनके बिल्कुल सामने बैठना होगा और उन्हें मुस्कुराकर देखना होगा। जैसे ही श्री राधा रानी उनकी आंखों में देखती हैं, वे कृष्ण की चंचलता और उनके प्रेम में खो जाती हैं। अंत में, कृष्ण कहते हैं कि उन्हें एक गुप्त मंत्र श्री जी के कान में कहना है जिससे नाव अपने आप चलने लगेगी। जैसे ही वे समीप जाकर उनके कान में "कृष्ण मनोहारिणी" कहते हैं, राधा रानी उन्हें पहचान लेती हैं। अंत में, कृष्ण अपना छद्म वेश त्याग कर अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो जाते हैं। यमुना की लहरों के बीच युगल सरकार (राधा-कृष्ण) की इस दिव्य झांकी और नौका विहार का आनंद लेकर सखियां निहाल हो जाती हैं। राधे राधे

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