
SHREE SHARMA
315 days ago
त्रिशूल और डमरू की उत्पत्ति भगवान शिव के धनुष का नाम पिनाक था। जिसे विश्वकर्मा ने ऋषि दधीचि की अस्थियों से तैयार किया था। सृष्टि से आरंभ में ब्रह्रानाद से जब शिव प्रगट हुए तो उनके साथ रज, तम और सत गुण भी प्रगट हुए। यही तीनों गुण शिवजी के तीन शूल यानी त्रिशूल बने। सृष्टि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सष्टि में ध्वनि जो जन्म दिया। लेकिन यह ध्वनि सुर और संगीत विहीन थी। उस समय भगवान शिव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वनि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ। डमरू को हिन्दू, तिब्बती और बौद्ध धर्म में बहुत महत्व दिया गया है! भगवान शंकर के हाथों में डमरू को दर्शाया गया है। डमरू की 14 आवाजें : - जब डमरू बजता है तो उसमें से 14 प्रकार की ध्वनि निकलती हैं! पुराणों में इसे मंत्र माना गया! यह ध्वनि इस प्रकार है:- 'अइउण्, त्रृलृक, एओड्, ऐऔच, हयवरट्, लण्, ञमड.णनम्, भ्रझभञ, घढधश्, जबगडदश्, खफछठथ, चटतव, कपय्, शषसर, हल् ! उक्त आवाजों में सृजन और विध्वंस दोनों के ही स्वर छिपे हुए हैं! यही स्वर व्याकरण की रचना के सूत्र धार भी है! सद्ग्रन्थों की रचना भी इन्ही सूत्रों के आधार पर हुई ! डमरू की ध्वनि जैसी ही ध्वनि हमारे अन्दर भी बजती रहती है, जिसे अ, उ और म या ओम् कहते हैं! हृदय की धड़कन व ब्रह्माण्ड की आवाज में भी डमरू के स्वर मिश्रित हैं!

Comments (1)

Rama Devi Sahu
Oct 19, 2025
🌺🌿🌺 Har Har Mahadev 🌺🌿🌺
