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बहुत गहरी बात सिखाने वाली कहानी से करते हैं। आज की कहानी: नजरिया और नमक एक बार एक दुखी शिष्य अपने गुरु के पास गया और बोला, "गुरुजी, मेरे जीवन में बहुत दुख और परेशानियाँ हैं। मैं बहुत थक गया हूँ।" गुरुजी ने कुछ नहीं कहा, बस शिष्य से एक मुट्ठी भर नमक लाने को कहा। जब शिष्य नमक ले आया, तो गुरुजी ने कहा, "अब इस नमक को एक गिलास पानी में डालो और उसे पीकर देखो।" शिष्य ने वैसा ही किया। गुरुजी ने पूछा, "इसका स्वाद कैसा है?" शिष्य ने मुँह बनाते हुए कहा, "बहुत ही कड़वा और खारा!" गुरुजी मुस्कुराए और फिर शिष्य को पास की एक साफ झील पर ले गए। उन्होंने कहा, "अब एक मुँह नमक इस झील में डालो और फिर झील का पानी पियो।" शिष्य ने झील का पानी पिया। गुरुजी ने पूछा, "अब इसका स्वाद कैसा है? क्या अभी भी खारा लग रहा है?" शिष्य बोला, "नहीं गुरुजी, यह तो बहुत मीठा और ताज़ा है!" सीख (Moral of the Story) गुरुजी ने शिष्य को समझाया: > "जीवन के दुख बिल्कुल नमक की तरह हैं—न कम, न ज्यादा। लेकिन हम उस दुख को कितना महसूस करते हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस बर्तन में डाल रहे हैं। जब तुम्हारा मन छोटा (गिलास जैसा) होगा, तो दुख बहुत बड़ा लगेगा। लेकिन जब तुम अपने मन को बड़ा (झील जैसा) कर लोगे, तो बड़े से बड़ा दुख भी फीका पड़ जाएगा।" > उम्मीद है यह कहानी आपके दिन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देगी!

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