
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
15 days ago
7.10.2026 समाज को सुखी बनाने के लिए योग दर्शन में एक उपाय बताया है, कि *"अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा न करें। चाहे धन संपत्ति हो, चाहे कपड़े हों, जूते चप्पल हों, बर्तन हों, बिस्तर हों, कोई भी समान हो, अपनी आवश्यकता से अधिक संग्रह न करें।"* योग दर्शन में इसे 'अपरिग्रह' के नाम से कहा जाता है। इससे दो लाभ होंगे। *"एक तो व्यक्ति को अधिक धन कमाना और खर्च नहीं करना पड़ेगा।" "दूसरा जब वह अपनी आवश्यकता तक ही वस्तुएं रखेगा, तो उन लोगों को भी वस्तुएं मिल सकेंगी जिनको सामान्य वस्तु रूप से वस्तुओं की कमी रहती है।" अर्थात समाज में देश में वस्तुओं की कमी नहीं रहेगी, सबको वस्तुएं प्रयोग करने के लिए मिल जाएंगी। "इससे व्यक्ति भी सुखी रहेगा, व्यर्थ के तनाव से बचेगा और समाज को भी सब वस्तुओं की आपूर्ति होती रहेगी। सबका जीवन सुखमय बनेगा।"* इसके साथ-साथ अपरिग्रह के अंतर्गत दूसरी बात विचारों की है। *"व्यर्थ के विचार या हानिकारक विचार भी मन में संग्रहीत न करें।"* आज हम देखते हैं, *"व्यक्ति व्यर्थ की बातों पर बहुत समय खर्च करते हैं। व्यापार जनसंख्या भुखमरी बेरोजगारी राजनीति इत्यादि ऐसे विषयों पर बहुत चर्चाएं और समय नष्ट करते हैं, जिनमें वे कुछ भी परिवर्तन नहीं ला सकते। इससे व्यक्ति का समय नष्ट होता है उसका तनाव बढ़ता है और व्यर्थ ही मन में अशांति उत्पन्न होती है।"* *"यदि आप इन समस्याओं से छूटना चाहते हों, तो अपने काम से संबंधित विचार करें। उस पर अधिक ध्यान दें। अपनी आध्यात्मिक भौतिक शारीरिक उन्नति करें, और प्रसन्न रहें।"* देश की समस्याओं पर चिंतन करना उनके समाधान ढूंढना और उनको देश में लागू करना, जिन लोगों के क्षेत्र का यह कार्य है, इस कार्य को वे लोग कर लेंगे, उन्हें करने दीजिए। *"इन बातों पर फालतू विचार करके आप अपना तनाव मत बढ़ाइए। क्योंकि आप इन क्षेत्रों में कोई परिवर्तन सुधार आदि कर नहीं सकते। न आपके पास इतनी संपत्ति है, ना सत्ता है, न अधिकार है। न शक्ति सामर्थ्य है।" "इसलिए अपने काम से काम रखें। भगवान का भजन करें। यथाशक्ति समाज की सेवा करें, और प्रसन्न रहें। यही तरीका है ठीक ढंग से जीवन जीने का।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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