
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
219 days ago
23.1.2026 लोग दूसरों को देखते हैं, और बिना सोचे समझे कुछ भी टीका टिप्पणी करना शुरू कर देते हैं। *"लोग गंभीरता से नहीं सोचते, कि बिना प्रमाण के जो हम सारा दिन दूसरों के बारे में कुछ-कुछ बोलते रहते हैं, व्यर्थ की टीका टिप्पणी करते रहते हैं, हमें इसका दंड भी भोगना पड़ेगा।"* दंड तो लोगों को समझ में आता ही नहीं है।इसीलिए वे गलतियां करते हैं। *"जहां-जहां दंड समझ में आ जाता है, वहां वे गलती नहीं करते।जैसे बिजली की तार छूने का दंड लोगों को समझ में आ गया। इसलिए लोग बिजली की तार को नहीं छूते। परंतु सिगरेट पीने का दंड समझ में नहीं आया, इसलिए पीते रहते हैं।"* तो कहने का तात्पर्य यह है कि *"दंड को समझें। व्यर्थ दूसरों की टीका टिप्पणी न करें। और दूसरा कोई आप पर व्यर्थ की टीका टिप्पणी करे, तो उसकी अधिक चिंता न करें। हां, इतना अवश्य है कि उसकी बात को ध्यान से अवश्य सुनें। यदि उसकी बात में 20 30% भी सत्य है, तो उतना दोष स्वीकार करें, और बाकी को हवा में उड़ा दें। अर्थात उसकी परवाह न करें। इससे आप व्यर्थ के तनाव से बच जाएंगे।"* दूसरी बात -- *"आपके आसपास के लोगों में बहुत से गुणवान लोग भी होते हैं। उन उनके गुणों को देखकर उन्हें अपने जीवन में धारण करें। इससे आपका कल्याण होगा, और आप चिंता तनाव मुक्त तथा सुखमय जीवन जी सकेंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
