
SHREE SHARMA
56 days ago
दो चींटियोंका दृष्टान्त दिया है संतोंने । एक नमकके ढेलेपर रहनेवाली चींटीकी एक मिश्रीके ढेलेपर रहनेवाली चींटीसे मित्रता हो गयी । मित्रताके नाते वह उसे अपने नमकके ढेलेपर ले गयी और कहा–‘खाओ !’ वह बोली–‘क्या खायें,यह भी कोई मीठा पदार्थ है क्या ?’ नमकके ढेलेपर रहनेवालीने उससे पूछा कि ‘मीठा क्या होता है, इससे भी मीठा कोई पदार्थ है क्या ?’ तब मिश्रीपर रहनेवाली चींटीने कहा–‘यह तो मीठा है ही नहीं । मीठा तो इससे भिन्न ही जातिका होता है ।’ परीक्षा करानेके लिये मिश्रीपर रहनेवाली चींटी दूसरी चींटीको अपने साथ ले गयी । नमकपर रहनेवाली चींटीने यह सोचकर कि ‘मैं कहीं भूखी न रह जाऊँ’ छोटी-सी नमककी डली अपने मुँहमें पकड़ ली । मिश्रीपर पहुँचकर मिश्री मुँहमें डालनेपर भी उसे मीठी नहीं लगी । मिश्रीपर रहनेवाली चींटीने पूछा–‘मीठा लग रहा है न ?’ वह बोली–‘हाँ-में-हाँ तो कैसे मिला दूँ ?बुरा तो नहीं मानोगी ? मुझे तो कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है, वैसा ही स्वाद आ रहा है ।’ उस मिश्रीपर रहनेवाली चींटीने विचार किया–‘बात क्या है ? इसे वैसा ही–नमकका स्वाद कैसे आ रहा है !’ उसने मिश्री स्वयं चखकर देखी, मीठी थी । वह सोचने लगी–‘बात क्या है !’ उसने पूछा–‘आते समय तुमने कुछ मुँहमें रख तो नहीं लिया था ?’ इसपर वह बोली–‘भूखी न रह जाऊँ,इसलिये छोटा-सा नमकका टुकड़ा मुँहमें डाल लिया था ।’ उसने कहा–‘निकालो उसे ।’ जब उसने नमककी डली मुँहमेंसे निकाल दी, तब दूसरीने कहा–‘अब चखो इसे ।’ अबकी बार उसने चखा तो वह चिपट गयी । पूछा–‘कैसा लगता है ?’ तो वह इशारेसे बोली–‘बोलो मत,खाने दो ।’ इसी प्रकार सत्संगी भाई-बहन सत्संगकी बातें तो सुनते हैं, पर धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिको पकड़े-पकड़े सुनते हैं । साधन करनेवाला, उसमें रस लेनेवाला उनसे पूछता है–‘क्यों ! कैसा आनन्द है ?’ तब हाँ-में-हाँ तो मिला देते हैं, पर उन्हें रस कैसे आये ? नमककी डली जो मुँहमें पड़ी है । मनमें उद्देश्य तो है धन आदि पदार्थोंके संग्रहका, भोगोंका और मान-पद आदिका । अत: इनका उद्देश्य न रखकर केवल परमात्माकी प्राप्तिका उद्देश्य बनाना चाहिये । नारायण! नारायण!! नारायण!!!

Comments (2)

बरखा शर्मा
Jul 5, 2026
jay shree krishn ji Radhe radh ji🙏🌹

सविता
Jul 5, 2026
भगवान प्रेम हैं और जहाँ प्रेम है, वही ईश्वर का वास है。 निस्वार्थ भाव से की गई प्रार्थना और दयालुता ही सबसे बड़ा धर्म है。
