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यह एक बहुत ही प्रचलित कहानी है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यह पूरी तरह से सही नहीं है। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के बनने के पीछे की असली कहानी एक हीरे की बिक्री से नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत त्रासदी और सामाजिक सेवा के संकल्प से जुड़ी है। यहाँ इसके निर्माण से जुड़े मुख्य तथ्य दिए गए हैं: * दोराबजी टाटा का संकल्प: सर दोराबजी टाटा की पत्नी, लेडी मेहरबाई टाटा, का निधन 1931 में 'ल्यूकेमिया' (ब्लड कैंसर) के कारण हुआ था। उस समय भारत में कैंसर के इलाज की कोई विशेष सुविधा नहीं थी, जिसके कारण उन्हें इलाज के लिए विदेश जाना पड़ा था। * अस्पताल की स्थापना: पत्नी की मृत्यु के बाद, सर दोराबजी टाटा ने संकल्प लिया कि वे भारत में एक ऐसा संस्थान बनाएंगे जहाँ कैंसर का इलाज सुलभ हो। 1932 में सर दोराबजी के निधन के बाद, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने इस सपने को पूरा किया। * उद्घाटन: 2 फरवरी 1941 को टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का उद्घाटन हुआ। यह भारत का पहला विशेष कैंसर अस्पताल था। "हीरे" वाली कहानी कहाँ से आई? शायद आप 'जुबली डायमंड' (Jubilee Diamond) की बात कर रहे हैं। यह सच है कि सर दोराबजी टाटा ने अपनी पत्नी के लिए यह मशहूर हीरा खरीदा था। 1924 में जब टाटा स्टील (TATA Steel) भारी आर्थिक संकट में थी, तब सर दोराबजी ने अपनी पूरी निजी संपत्ति और पत्नी के गहनों (जिसमें यह हीरा भी शामिल था) को बैंक में गिरवी रखकर कंपनी को दिवालिया होने से बचाया था। निष्कर्ष: हीरे का इस्तेमाल टाटा स्टील को बचाने के लिए किया गया था, जबकि टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का निर्माण टाटा ट्रस्ट द्वारा कैंसर के खिलाफ जंग लड़ने के उद्देश्य से किया गया था।

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