
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
3 days ago
19.10.2026 मनोविज्ञान का यह नियम है कि *"एक दूसरे के गुण दोष देखने से उसका एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता है।"* इसलिए हमारे गुरुजी पूज्य स्वामी सत्यपति जी महाराज कहा करते थे, *"यदि आपको दोष देखने हों, तो अपने देखिए। और यदि गुण देखने हों, तो दूसरों के देखिए।" क्योंकि मनोविज्ञान के नियमानुसार "यदि आप दूसरों के दोष देखेंगे, तो वे आपके अंदर आ जाएंगे। यदि आप दूसरों के गुण देखेंगे, तो वे आपके अंदर आ जाएंगे।"* *"इसलिए यदि आप अपने अंदर गुणों की वृद्धि करना चाहते हों, तो दूसरों के गुण देखें। तब कुछ ही समय में वही गुण आपके अंदर भी आने लग जाएंगे।"* *"यदि आप अपने गुणों को देखेंगे, तो उससे आपके अंदर अभिमान उत्पन्न होगा। वह अभिमान आपके विनाश का कारण बनेगा।" "इसलिए अपने गुण न देखें। अपने तो दोष देखकर उन्हें दूर करें, जिससे आपको जीवन में लाभ होगा।"* *"अतः अपने दोषों को देखें, और उन्हें दूर करें। क्योंकि दोष सदा दुखदायक होते हैं, अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी। गुण सदा सुखदायक होते हैं, अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी।"* *"दूसरों में गुण देखने की कोई उम्र नहीं होती। बचपन से बुढ़ापे तक किसी भी उम्र में आप दूसरों के गुण देख सकते हैं, और उन्हें सीख सकते हैं। इसलिए गुण तो सदा ही देखें, ताकि सदा आपके गुण बढ़ते रहें, और आपके जीवन में सुख भी बढ़ता रहे।"* *"तथा दोष तो कभी भी नहीं देखने चाहिएं, क्योंकि उससे तो सदा हानि ही होगी, जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं।"* *"इस कारण से यदि आप जीवन में उन्नति करना चाहते हों, सुख प्राप्त करना चाहते हों, तो दूसरों के गुण देखें, उन्हें धारण करें। तथा अपने दोषों का निरीक्षण परीक्षण करके शीघ्र ही उन्हें दूर करें। तो ही आपका जीवन उन्नत होगा, और आप सुखी जीवन जीएंगे। और धीरे-धीरे मोक्ष तक भी पहुंच जाएंगे।"* --- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़ गुजरात।"*

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
