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*अमृत कलश* ➖➖➖➖🪴➖➖➖➖ *🪴 ऋषि चिंतन 🪴* ➖➖➖➖🪴➖➖➖ *हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य* *आत्मा को जानें* ➖➖➖➖🪴➖➖➖➖ *👉 मनुष्य पाप, बुढ़ापे, मृत्यु, भूख, प्यास की चिंता तथा भय के कारण अनेक संकल्प-विकल्प के उत्पन्न होने वाले शोक, उद्विग्नता आदि से जीवन के सहज स्वाभाविक सुख और उपलब्धियों का भी लाभ नहीं उठा पाता।* सुर दुर्लभ मानव जीवन को भार, अभिशाप मानकर जीता है। *भय की कुकल्पनाएँ उसे चैन से नहीं सोने देती है और न सुखी जीवन बिताने देती हैं।* इन सबसे छुटकारा पाकर जीवन को सुखी व मधुर बनाने की खोज मनुष्य सदा से ही करता आया है। उपनिषदकार ने इसी को महत्त्व देते हुए कहा है- *विमुत्युर्विशोष विजिघत्सोउपिपासाः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्येष्टयः ॥* *आत्मापहतपाप्मा विजरो विजिज्ञासितव्य ।* *छान्दो० ८.७१* अर्थात् *"जो निष्पाप, जरा रहित, अमर्त्य, शोक रहित, भूख-प्यास में मुक्त, सत्य काम, सत्य संकल्प है, उसे ही ढूँढना चाहिए उसे जानने की इच्छा करनी चाहिए और वह तत्त्व है-आत्मा।"* 👉 *वस्तुतः आत्मा ही जरा-मरण, भूख-प्यास, समस्त भय संदेह, संकल् विकल्पों से रहित नित्य मुक्त, अजर-अमर-अविनाशी तत्त्व है।* उसे प्राप्त कर लेने पर ही मनुष्य समस्त, भय, शोक, चिंता, क्लेशों से मुक्त हो जाता है। 👉 *आत्मा सर्वव्यापी नित्य तत्त्व है।* आत्मा ही मानव जीवन का मूल सत्य है। *आत्मा के प्रकाश में ही बाह्य संसार और मानव जीवन के कार्य-कलापों का अस्तित्व है।* आत्मा के पटल पर ही संसार और दृश्य जीवन का छाया-नाटक बनता-बिगड़ता रहता है। *संसार जो कुछ भी है, वह आत्मा की अभिव्यक्ति और उसका विस्तार है।* ऐतरेय ब्राह्मण में आया है- *आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत्किञ्चन मिषत्।* *स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । - ऐतरेयो० १.१.१* *पूर्व में केवल एकमात्र आत्मा ही था अन्य कोई तत्त्व नहीं था। उस आत्मा में से ही अनेक लोकों का सृजन हुआ।* छांदोग्योपनिषद् (७.२५.२) में लिखा है- *आत्मैवेदं सर्वम्।* आत्मा ही यह सब है। *आत्मा के धरातल पर ही दृश्य जगत् के घरोंदे बनते-बिगड़ते रहते हैं।* सृजन और संहार का चक्र चलता रहता है। किंतु यह आत्म-तत्व अपने नित्य स्वरूप में स्थिर रहता है सदा-सदा। अनंत आकाश के मध्य ग्रह-नक्षत्रों का क्रिया-कलाप चालू रहता है। अनेक उल्काएँ नक्षत्र बनते-बिगडते रहते हैं, किंतु आकाश अपने गुरु गंभीर अविचल स्वरूप में नित्य ही स्थित रहता है। *इसी तरह सर्वत्र व्याप्त आत्म-तत्व के मध्य पदार्थों का सृजन और विनाश होता रहता है किंतु आत्म-तत्त्व पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह सदा-सर्वदा नित्य है।* 👉 *सर्वव्यापी विराट् आत्मसत्ता ही ब्रह्म है।" अयम् आत्या ब्रह्य" (बृ० उ०) यह आत्मा ही ब्रह्म है,* ऐसा उपनिषद्‌कार ने अपनी अनुभूति के आधार पर कहा है। *आत्मा ही परमात्मा है-ईश्वर है।* आत्म-तत्त्व जब जगत, देह, इंद्रिय तथा संसार के पदार्थों को प्रकाशित करता है, तो अनेक रूपों में दिखाई देता है। *जिस तरह जल की बूँदें समुद्र पर गिरते समय अलग-अलग दिखाई देती हैं, किंतु गिरने से पूर्व और गिरने पर वह अथाह सिंधु के रूप में ही होती है।* आत्मा भी आदि-अंत में हमेशा ही स्थिर रहने वाला नित्य तत्त्व है। विराट है, भूमा है- "यो वै भूमा।" 👉 *आत्म-प्रबोध उपनिषद् (१९) में लिखा है-घटावभासको भानुर्घटनाशेन नश्यति । देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति ॥* *"जिस तरह घड़े को प्रकाशित करने वाला सूर्य घड़े के न होने पर नष्ट नहीं होता है, उसी तरह देह के नाश होने पर आत्मा नाश नहीं होता।"* ➖➖➖➖🪴➖➖➖➖ *जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता* - आत्मज्ञान *पृष्ठ *८४ *पं. श्रीराम शर्मा आचार्य * ➖➖➖➖🪴➖➖➖➖

Comments (3)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 16, 2025

Shubha Ravivar ki Subha Kamanayen ke Sath Subha Madhyahana Jii 🙏 Bhagwan Shri Surya Dev Ji ki Aasirbad se Aap or Aap ke Pure Parivar ko Hamesha Mangal Rakhe or Swastha Surakshit Rakhe 🙏 Aap ka Har Pal Subha Mangalmay Ho 🙏🌹🌹

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 16, 2025

🙏🌞 Om Surya Devay Namah 🌞🙏

RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩

RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩

Nov 16, 2025

ॐ श्री सूर्य देवाय नमो नमः शुभ रविवार ये शुभ दिन शुभफलदाई मंगलकारी रहे शुभ सुप्रभातम वंदन एवम स्नेहिल सादर नमन 🌹🙏