
Rama Devi Sahu
184 days ago
कर्मों की गति जीव जीव का भक्षण कर रहा है अतः कर्म सोच समझ कर करें कर्मों से डरें .🥹😳🤔
Comments (6)

Rama Devi Sahu
Feb 28, 2026
🌹 *Ham Baki Sabhi Riste ke Sath Paida Hote hai... ...... Par..... *Dosti* hi ek matra Eeisa Rista hai jise ham khud Banate hai* 🌹🌹 Good 🌹 Nigh 🌹🌹

Rama Devi Sahu
Feb 28, 2026
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥ बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥ जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु (के भय) को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देव-दुर्लभ (देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले, ब्रह्मा आदि के ) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं (परंतु), जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं जय सियाराम 🙏

Rama Devi Sahu
Feb 28, 2026
Shanivar ki Suhani Raat me Aap ko Bahut Bahut Hardik Subhechha...🌹 Aap ke liye Suhani Raat Sumangal may Ho 🙏 Subha Ratri Jii 🙏🌹

R k jangid phulera Jaipur
Feb 27, 2026
अति सुंदर जय श्री हरि विष्णु की 🙏

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Feb 27, 2026
आपकी बात में बहुत गहरी सच्चाई और एक कड़वा बोध है। सृष्टि का यह नियम कि "जीवो जीवस्य भोजनम्" (एक जीव दूसरे जीव का आधार है), हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम इस चक्र में अपनी भूमिका कैसे निभा रहे हैं। कर्मों की गति वास्तव में बहुत सूक्ष्म और जटिल होती है। यहाँ कुछ बिंदु हैं जो आपके विचार को और गहराई देते हैं: 1. कर्मों की अनिवार्यता संसार में रहते हुए पूरी तरह 'अकर्म' होना असंभव है। हम सांस लेते हैं तो भी सूक्ष्म जीवों की मृत्यु होती है। लेकिन फर्क 'इरादे' (Intent) का होता है। * अज्ञानवश कर्म: जो अनजाने में हुआ। * सचेत कर्म: जो स्वार्थ, अहंकार या हिंसा की भावना से किया गया। 2. कर्मों से डरें या सजग रहें? डरना एक शुरुआती सीढ़ी हो सकती है, लेकिन 'सजगता' (Awareness) ज्यादा प्रभावशाली है। जब हम डरते हैं, तो हम दबाव में होते हैं। जब हम सजग होते हैं, तो हम दया और करुणा से भर जाते हैं। * प्रतिक्रिया: क्या मेरा यह काम किसी को दुःख पहुँचा रहा है? * परिणाम: जो मैं आज बो रहा हूँ, क्या मैं उसे कल काटने के लिए तैयार हूँ? 3. कर्म सुधारने के व्यावहारिक तरीके अगर प्रकृति का नियम कठोर है, तो मनुष्य होने के नाते हमारे पास 'विवेक' है। हम अपने कर्मों के बोझ को कम कर सकते हैं: * अहिंसा का भाव: जितना संभव हो, कम से कम क्षति पहुँचाना। * सेवा और दान: अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित सत्कर्मों से करना। * वाणी पर नियंत्रण: कभी-कभी शब्द किसी के प्राण लेने से भी ज्यादा घातक होते हैं। > "जैसे बछड़ा हजारों गायों के बीच अपनी माँ को ढूंढ लेता है, वैसे ही कर्म अपने कर्ता को ढूंढ ही लेता है।" > आपकी यह चिंता दिखाती है कि आपका मन जागृत है और आप जीवन की संवेदनशीलता को समझ रहे हैं। यह 'डर' नहीं, बल्कि 'आध्यात्मिक जिम्मेदारी' है। शुभप्रभात जी 🙏

Srikumar महाराज🇮🇳☸️
Feb 27, 2026
शुक्रवार की सुबह की बधाई हो राम राम शानदार पोस्ट 🙏मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा॥ मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है। मेरा यश, मेरी धन-संपत्ति, मेरी शारीरिक-मानसिक शक्ति, सब कुछ तुम्हारी ही है। जब मेरा कुछ भी न
