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यह मनमोहक कथा यमुना नदी के पावन तट पर बसे वृंदावन की है, जहाँ प्रकृति स्वयं अपनी सुंदरता बिखेर रही है। हरे-भरे पेड़ों की छांव तले, जहाँ अनगिनत रंग-बिरंगे फूल खिले हैं, भगवान श्री कृष्ण अपने बाल-सखाओं के साथ एक मनोरंजक खेल खेल रहे हैं। इस चित्र में श्री कृष्ण की आंखों पर एक सुंदर रेशमी पट्टी बंधी है, जो यह दर्शाती है कि वे 'आंख मिचौली' (hide and seek) के खेल में 'ढूंढने वाले' (it) हैं। वे अपनी दिव्य मुस्कान के साथ हवा में हाथ बढ़ाकर अपने मित्रों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। श्री कृष्ण के तीनों मित्र इस खेल का पूरा आनंद ले रहे हैं। एक मित्र पेड़ के तने के पीछे से शरारती मुस्कान के साथ झांक रहा है, दूसरा मित्र मस्ती में दौड़ते हुए श्री कृष्ण के बहुत करीब से गुजर रहा है, और तीसरा मित्र फूलों के बीच जमीन पर लेटा हुआ है और श्री कृष्ण की हर हरकत को ध्यान से देख रहा है। वह अपनी हंसी रोकने की कोशिश कर रहा है ताकि कृष्ण उसे पकड़ न सकें। पृष्ठभूमि में यमुना नदी का शांत जल और उगता हुआ सूरज इस दृश्य को और भी अलौकिक बना रहा है। नदी के दूसरी तरफ गायें घास चर रही हैं। इस लीला में श्री कृष्ण के प्रिय मोर भी पीछे नहीं हैं। एक सुंदर मोर चट्टान पर बैठकर अपने शानदार पंख फैलाए हुए खेल को देख रहा है। उसके पंखों का रंग और उसकी उपस्थिति इस पावन वातावरण में दिव्यता और सुंदरता जोड़ रही है। श्री कृष्ण ने मोर पंख से सजा मुकुट, फूलों की माला और सुंदर वस्त्र पहने हैं। उनका दिव्य शरीर हल्की नीली आभा (light blue aura) से चमक रहा है। यह चित्र बाल लीला की निर्दोषता, मित्रों के बीच निश्छल प्रेम और वृंदावन की सुंदरता का एक जीवंत चित्रण है, जो किसी भी भक्त के हृदय को आनंदित कर देता है।

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