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कान्हा की बाल लीलाओं में उनकी चतुराई और मासूमियत का अद्भुत संगम मिलता है। यमुना तट पर बालू (रेत) और घुंघरुओं वाला यह प्रसंग बहुत ही प्यारा है। जब नटखट कृष्ण यमुना किनारे खेलने जाते या माखन चोरी के लिए निकलते, तो उनके पैरों में बंधे पैंजनी (घुंघरुओं) की आवाज से यशोदा मैया को उनके आने-जाने का पता चल जाता था। अपनी "चोरी" पकड़े जाने के डर से कान्हा एक अनूठी तरकीब निकालते थे: कान्हा की नटखट चतुराई * बालू का उपयोग: वे यमुना की कोमल रेत (बालू) मुट्ठी में भरते और उसे अपने छोटे-छोटे घुंघरुओं के छेद में ठूंस-ठूंस कर भर देते थे। * मौन पदचाप: रेत भरने की वजह से घुंघरुओं के अंदर के कंकड़ हिलना बंद हो जाते थे, जिससे छम-छम की आवाज आना बंद हो जाती। * मैया को चकमा: फिर वे दबे पांव ऐसे चलते कि मैया यशोदा को उनके महल में होने या बाहर जाने की आहट तक नहीं मिलती थी। इस लीला का आध्यात्मिक भाव भक्त कवि सूरदास जी ने इस बाल लीला का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। यह प्रसंग दिखाता है कि भगवान, जो पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं, अपनी माता के प्रेम और डांट के डर से कैसे एक साधारण बालक की तरह मासूम हरकतें करते हैं। > "पायन पैंजनी बाजत नीकी" — जब वो रेत निकाल देते, तो वही आवाज मैया के कानों में संगीत जैसी लगती थी। >

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