
SHREE SHARMA
87 days ago
प्राचीन समय की बात है, श्री दास जी महाराज नामक एक परम विरक्त और श्रद्धालु महात्मा हुए। उनका जीवन केवल एक ही नियम पर टिका था— 'सन्त सेवा ही प्रभु सेवा है'। वे मानते थे कि मंदिर की मूर्ति में जो चेतना है, वही चेतना संतों के हृदय में साक्षात स्पंदित होती है। उनके द्वार से कभी कोई साधु-सन्त बिना सेवा और भोजन के नहीं लौटा। एक बार की बात है, श्री दास जी के आश्रम में संतों की एक बड़ी मंडली पधारी। संध्या का समय था, आकाश में लालिमा छाई थी और मंदिर में शंख-घड़ियाल गूंज रहे थे। संध्या आरती संपन्न हुई। दास जी ने बड़े चाव से संतों के लिए उत्तम भोजन तैयार करवाया। भोजन के उपरांत, शीतल रात्रि में उन्होंने सभी संतों के विश्राम की व्यवस्था की। दास जी का हृदय आनंद से भरा था। वे एक-एक सन्त के पास जाते, उनके चरण दबाते, उनके वस्त्र व्यवस्थित करते और उनकी आध्यात्मिक चर्चा सुनते। संतों की सेवा के उस रस में वे ऐसे डूबे कि उन्हें समय का भान ही नहीं रहा। आधी रात बीत गई, पर दास जी संतों के चरणों की सेवा में लगे रहे। इस तन्मयता में वे यह भूल गए कि मंदिर में विराजमान ठाकुर जी (श्री विग्रह) को भी भोग लगाकर, जल पिलाकर और शयन कराकर विश्राम देना था। ठाकुर जी रात भर मंदिर के सिंहासन पर खड़े के खड़े रह गए। भोर हुई, पक्षी चहकने लगे। 'मंगला आरती' का समय हुआ तो दास जी स्नान करके मंदिर के द्वार पर पहुँचे। लेकिन यह क्या? मंदिर के पट (किवाड़) अंदर से बंद थे। उन्होंने बहुत प्रयास किया, पुकारा, अनुनय-विनय की, पर द्वार टस से मस न हुए। दास जी का हृदय कांपने लगा। वे सोचने लगे, "क्या मुझसे कोई घोर अपराध हो गया? क्या प्रभु मुझसे रुष्ट हैं?" वे रोते हुए द्वार पर गिर पड़े। तभी मंदिर के भीतर से एक गंभीर और ओजस्वी आकाशवाणी हुई: "दास जी! अब ये किवाड़ नहीं खुलेंगे। मेरी सेवा रहने दो, तुम केवल संतों की ही सेवा करो। तुमने कल रात मेरी सुध नहीं ली, मैं रात भर प्यासा और भूखा सिंहासन पर खड़ा रहा। तुमने मुझे शयन तक नहीं कराया। अब मैं तुम्हारी सेवा स्वीकार नहीं करूँगा।" साधारण भक्त होता तो वह डर जाता, क्षमा माँगता और प्रायश्चित की बात करता। पर दास जी का भाव अनन्य था। उन्होंने हाथ जोड़कर, आंखों में अश्रु भरकर बड़े सरल भाव से कहा: "हे प्राणनाथ! हे अंतर्यामी! यदि संतों की सेवा में तल्लीन होने के कारण आपकी सेवा में कोई चूक हुई है, तो मुझे आपकी नाराजगी का तनिक भी भय नहीं है। क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप अपनी उपेक्षा तो सह सकते हैं, पर अपने भक्तों का अनादर नहीं। यदि मैं आपकी सेवा में लगा रहता और बाहर बैठा कोई सन्त प्यासा रह जाता या उसके चरणों में थकान रह जाती, तो मुझे आपकी नाराजगी का भारी भय होता। प्रभु! आप तो घट-घट वासी हैं, क्या संतों के हृदय में आप ही नहीं विराजते?" दास जी का यह अटूट विश्वास और संतों के प्रति निष्ठा सुनकर भगवान का हृदय द्रवित हो गया। वे स्वयं को रोक न सके। अचानक मंदिर के भारी किवाड़ अपने आप खुल गए। भीतर से दिव्य प्रकाश पुंज निकला और भगवान ने साक्षात प्रकट होकर दास जी को हृदय से लगा लिया। भगवान मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले: "धन्य हो दास जी! तुमने आज भक्ति का असली मर्म समझा दिया। जो मेरे भक्तों को मुझसे बड़ा मानता है, मैं उसके वश में हो जाता हूँ। संतों की सेवा ही मेरी असली प्रसन्नता है। मैं तुम्हारी निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हूँ।" प्रभु ने दास जी को आशीर्वाद दिया कि उनकी सन्त सेवा सदैव अक्षुण्ण रहेगी और उनके भंडार कभी खाली नहीं होंगे। कथा का आध्यात्मिक संदेश 1. अद्वैत भाव: भगवान और उनके भक्त दो नहीं, एक ही हैं। भक्त का सम्मान ही भगवान का सम्मान है। 2. निर्भयता: सच्चा भक्त भगवान से डरता नहीं है, वह भगवान के सिद्धांतों (जैसे भक्त-वत्सलता) पर अधिकार रखता है। "राम ते अधिक, राम कर दासा" (अर्थ: भगवान राम से भी अधिक महिमा उनके दासों/भक्तों की है।) 🙏🙏🙏🌹🌹जय श्री कृष्ण!🌹🌹🙏🙏🙏🙏

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