
SHREE SHARMA
70 days ago
माया:: वैष्णव दर्शन में माया भगवान की दासी-शक्ति है, शत्रु नहीं। वह जीव को भगवान से दूर इसलिए नहीं करती कि उसे भगवान से द्वेष है, बल्कि इसलिए कि जीव ने स्वयं भगवान से विमुख होने का चुनाव किया है। माया उसी इच्छा के अनुसार संसार का अनुभव कराती है। जब जीव भगवान की ओर मुड़ता है, वही माया उसे भगवान के चरणों तक पहुँचा देती है। १. माया भगवान की शक्ति है:: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ यह मेरी दैवी माया है, जो तीन गुणों से बनी है और बड़ी कठिनता से पार की जा सकती है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इसे सहज ही पार कर लेते हैं। यहाँ भगवान माया को "मम माया" (मेरी माया) कहते हैं। वह स्वतंत्र नहीं, भगवान की आज्ञा से कार्य करती है। २. माया भक्तों को नहीं, भगवान-विमुख जीवों को बाँधती है कृष्ण भूलि' सेइ जीव अनादि बहिर्मुख। अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥ जो जीव अनादिकाल से कृष्ण को भूलकर उनसे विमुख हो गया है, उसी को माया संसार के दुःखों में बाँधती है। अर्थात् माया कारण नहीं, जीव की भगवान-विमुखता कारण है। ३. माया का उद्देश्य दण्ड नहीं, शिक्षा है:: जैसे माता अपने बालक को अनुशासित करती है ताकि वह सही मार्ग पर लौट आए, वैसे ही माया जीव को संसार के सुख-दुःख का अनुभव कराकर यह सिखाती है कि वास्तविक सुख केवल भगवान में है। भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद् ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। जब जीव भगवान से विमुख होकर संसार में आसक्त हो जाता है, तब भय, मोह और दुःख उत्पन्न होते हैं। ४. भक्त के लिए वही माया योगमाया बन जाती है:: श्रीकृष्ण की दो प्रमुख शक्तियाँ कही गई हैं— महामाया — जो भगवान-विमुख जीवों को बाँधती है। योगमाया — जो भक्तों को भगवान की लीलाओं में प्रवेश कराती है। वृन्दावन की गोपियाँ, नन्द बाबा, यशोदा मैया आदि योगमाया के प्रभाव में थे। इसलिए वे श्रीकृष्ण को केवल भगवान नहीं, अपने प्रियतम, पुत्र और सखा के रूप में अनुभव करते थे। निष्कर्ष:: माया भगवान से दूर नहीं ले जाती; वह केवल उन लोगों को संसार में उलझाती है जो भगवान से मुँह मोड़ते हैं। जैसे ही जीव श्रीकृष्ण की ओर एक कदम बढ़ाता है, माया उसका मार्ग छोड़ देती है और उसे भगवान के चरणों तक पहुँचा देती है। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त बन्धनों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो। इसलिए वैष्णव आचार्य कहते हैं— माया भगवान की द्वारपाल है। जो कृष्ण से विमुख है, उसे वह संसार में रोकती है; और जो कृष्ण की शरण में आता है, उसके लिए वह स्वयं द्वार खोल देती है। ~जय श्री कृष्ण~

Comments (4)

Rama Devi Sahu
Jun 21, 2026
ज़िंदगी की परिभाषा कभी दूसरों से मत लेना, यह आपकी ज़िंदगी है इसे खुद परिभाषित करो आपके बारे में आपसे बेहतर कोई नहीं जानता....जय श्री कृष्णा जी शुभ रात्रि वंदन जी 🌹❤️🌹

Jyoti Agarwal
Jun 21, 2026
राधे राधे 🙏

बरखा शर्मा
Jun 21, 2026
🌹🌹RADHE RADHE JI 🌹SHUBH RATRI JI🌹🌹

Shah 🩷
Jun 21, 2026
*🪷 ।। जय श्री कृष्ण ।।🪷*
