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*🪦सृष्टि की रचना से भी पहले का रूप शिव है। परंतु ध्यान रखने की बात ये है कि शिव केवल रचयिता नहीं हैं, वे ही पालनकर्ता और संहारकर्ता भी हैं, स्वयं में सब विलीन करते हैं। अतः भौतिक सृष्टि के निर्माण के लिए ब्रह्मा जी का प्रदुर्भाव हुआ था, सृष्टि को चलाने वाले भगवान विष्णु हैं।* परंतु जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करी तब उन्हें कई सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था, उनके द्वारा रचित जीव ही उनकी बात नहीं सुन रहे थे। और जब सृष्टि में असंतुलन पैदा होता है तब तब भगवान शिव, भगवान नारायण और भगवती दुर्गा भिन्न भिन्न अवतार स्वरूपों में प्रकट होते हैं और समाधान निकलते हैं। अतः ब्रह्मा जी ने भगवान शिव का ध्यान किया जिसके फलस्वरूप महादेव ने एक महाशक्तिशाली अवतार लिया था और ब्रह्मा जी के मस्तक से ही इस भौतिक सृष्टि में प्रकट हो गए, उनका सृष्टि में प्रवेश करने का उद्देश्य था सृष्टि में अस्थिरता उत्पन्न करने वाले तत्वों का नाश करना ताकि ब्रह्मा रचना कर सकें और नारायण पालन कर सके, कोई रुकावट ना आए इसलिए शिव जी स्वयं ही भौतिक संसार में अवतरित हुए। शिव का यह अवतार स्वरूप नील-लोहित वर्ण का था अर्थात नीला और लाल। वह रूप कुछ इस प्रकार था कि वो जोर जोर से दहाड़ता और रोता जिसके कारण ब्रह्मा ने उसे एक आम लड़का समझकर रुद्र नाम से संबोधित किया, क्योंकि वह व्यक्ति ब्रह्मा जी को उनके भीतर चल रहे क्रोध और पीड़ा के भाव को दर्शा रहा था, रुद्र नाम का अर्थ है रुदन (दुख) का नाश करने वाला, जो वैसे भी महादेव का नाम है ही। नील लोहित में नीला रंग इसलिए क्योंकि वह अनन्ता और दिव्यता का प्रतीक है और क्योंकि उस क्षण ब्रह्मा जी के मन का भाव उग्र था, यानी वे क्रोध और दुख में थे, इस कारण से लोहित अर्थात लाल वर्ण, लाल रंग शिव की शक्तियों को दर्शाता है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है *•"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।"* इसका `•अर्थ-` है कि जैसा जिसका भाव होता है, उसे ईश्वर वैसे ही रूप में दिखाई देते हैं, इसलिए ब्रह्मा जी ने जब शिव जी को याद किया तो मन में दुख और क्रोध का भाव होने के कारण महादेव उनके समक्ष उसी रूप में प्रकट हुए। तो जब वह व्यक्ति (जो स्वयं शिव जी ही थे), जब वह पुरुष ब्रह्मा जी की कल्पना से भी अधिक शक्तिशाली प्रतीत हुआ, तत्पश्चात ब्रह्मा जी को समझ आ गया कि वह कोई साधारण पुरुष नहीं अपितु स्वयं महादेव ही हैं। अतः संसार की सभी नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करने के लिए ही शिव जी ने अपने समान 11 रुद्रों को प्रकट किया और फिर स्वयं उस नील लोहित रूप में इस भौतिक सृष्टि में ही स्थित कैलाश पर्वत पर विराजित हो गए। अतः भगवान शिव को गोरा बताना और नीला बताना दोनों ही सही है, बस यह है कि श्वेत वर्ण यानी शिव जी का सफेद वाला रूप इस सृष्टि से परे है और नीला वाला रूप इसी भौतिक सृष्टि में स्थित है, अर्थात शिव जी का नीला स्वरूप उनका दिव्य अवतार है। परंतु इसका यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि शिव जी संसार में विनाशक रूप में प्रकट हुए तो वे गुस्से वाले हैं, शिव जी परम दयालु, परम कृपालु हैं, चाहे वे अलौकिक हों या हमारे भूलोक में विराजमान हो। तो महादेव का स्वरूप नीला बताना बिल्कुल सही है क्योंकि इसी रूप में शिव जी संसार के संहारकर्ता (विलीनकर्ता) की भूमिका निभाते हैं, सफेद रंग के शिव स्वयं ही नीले रंग के शिव रूप में प्रकट होते हैं। *♿#हरहर_महादेव_शिवशंभू♿* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱

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