
SHREE SHARMA
136 days ago
यह कहानी विश्वास और समर्पण की एक बहुत ही मार्मिक और गहरी सीख देती है। वर्षों के कठिन प्रशिक्षण और अटूट संकल्प के साथ, एक पर्वतारोही ने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी को फतह करने का निर्णय लिया। उसकी महत्वाकांक्षा इतनी प्रबल थी कि उसने इस गौरव को किसी और के साथ साझा न करने की ठानी और अकेले ही अपनी यात्रा शुरू की। अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह दिन बीतते गए और वह अपनी मंजिल के करीब पहुँचने लगा। एक शाम, जब सूर्य ढल चुका था और काली घटाओं ने चंद्रमा को पूरी तरह ढक लिया था, उसने रुकने के बजाय अपनी चढ़ाई जारी रखी। शिखर बस कुछ ही फीट दूर था, तभी अचानक बर्फ की एक सिल्ली खिसकी और वह अनियंत्रित होकर खाई में गिरने लगा। हवा की सनसनाहट और मौत की आहट के बीच उसे महसूस हुआ कि उसकी कमर से बंधी सुरक्षा रस्सी ने उसे एक झटके के साथ हवा में थाम लिया है। सन्नाटे को चीरते हुए उसने पुकारा, "हे ईश्वर! मुझे बचा लो!" तभी एक गंभीर स्वर गूँजा: "क्या तुम्हें वास्तव में मुझ पर अटूट विश्वास है?" पर्वतारोही ने कांपते हुए कहा, "हाँ प्रभु, शत-प्रतिशत!" आवाज़ आई: "तो फिर, अपनी कमर से बंधी इस रस्सी को काट दो।" पर्वतारोही सन्न रह गया। नीचे पाताल जैसा अंधेरा था और ऊपर केवल वही पतली सी रस्सी उसका एकमात्र सहारा थी। उसने अपने तर्क और डर को भगवान के आदेश से ऊपर रखा और रस्सी को और मजबूती से जकड़ लिया। अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण ने उस घाटी को छुआ, तो बचाव दल को एक हृदयविदारक दृश्य मिला। उस पर्वतारोही का शरीर ठंड से जम चुका था, उसके हाथ रस्सी को पूरी ताकत से पकड़े हुए थे... और वह ज़मीन से मात्र 5 फुट की ऊँचाई पर लटका हुआ था। अगर उसने केवल एक बार उस 'रस्सी' (अपने अहंकार और संशय) को काट दिया होता, तो वह सुरक्षित धरती पर होता। कहानी की सीख हम सभी अपने जीवन में अपनी-अपनी 'रस्सियों' (जैसे- पद, पैसा, तर्क या डर) को पकड़े हुए हैं। हम ईश्वर से मदद तो मांगते हैं, लेकिन जब वह हमें कुछ छोड़ने को कहता है, तो हमारा डर हमारे विश्वास पर हावी हो जाता है। याद रखें: ईश्वर का दृष्टिकोण हमारे दृष्टिकोण से कहीं बड़ा है। जहाँ हमारा तर्क समाप्त होता है, वहीं से 'श्रद्धा' शुरू होती है। वह कभी गिरने नहीं देता, बस हमें अपनी पकड़ ढीली करनी होती है। जय श्री कृष्ण। जय श्री राम।

Comments (4)

vijay kushwaha
Apr 16, 2026
जय श्री राधे कृष्ण

सविता
Apr 16, 2026
bahut sunder katha

सविता
Apr 16, 2026
Radhe Radhe

Rama Devi Sahu
Apr 16, 2026
🙏🙏💞 राधे राधे मेरे कान्हा 💞🙏🙏 लगाव रखना इंसान की स्वाभाविक भावना है, लेकिन हर जुड़ाव सही नहीं होता। जहाँ पारस्परिक सम्मान, स्पष्टता और अपनापन न हो, वहाँ खुद के लिए सीमाएँ तय करना भी उतना ही जरूरी हो जाता है। क्योंकि बिना सीमाओं के रिश्ते अक्सर उम्मीदों का बोझ बन जाते हैं, और वही उम्मीदें धीरे-धीरे मन की शांति छीन लेती हैं। ज़िंदगी हमें यही सिखाती है कि— अपनी भावनाओं की कद्र करें, जहाँ सम्मान मिले वहीं दिल लगाएँ, और जहाँ नहीं… वहाँ खुद को संभालना सीखें। क्योंकि सच्चा सुकून वहीं मिलता है, जहाँ दिल को ठहराव और आत्मा को सम्मान मिलता है… !! 🙏🙏🌹🌹राधे राधे 🌹🌹🙏🙏
