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‌‌‌‌(द्वितीय प्रसारण/१७८७) ********************************** 🙏 *श्रीराम–जय राम–जय जय राम*🙏 ********************************** 🌞 *श्रीरामचरितमानस* 🌞 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *पंचम सोपान* *सुन्दरकाण्ड* *दोहा संख्या ०७* *(अर्धाली सं० ४ एवं ५)* *श्रीहनुमानजी-विभीषणजी संवाद* *विभीषणजी श्रीहनुमानजी से कहते हैं कि*– *अब मोहि भा भरोस हनुमंता ।* *बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥४॥* *जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा ।* *तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥५॥* अर्थ– हे हनुमान्‌ ! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते। जब श्रीरघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओर से) दर्शन दिये हैं। 🌺🌺 *व्याख्या*🌺🌺 👉 _*अब मोहि भा भरोस हनुमंता*_– (क) विभीषणजी ने प्रथम पूछा कि प्रभु कभी मुझ अनाथ पर कृपा करेंगे, (यथा– *'तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥'*) अब उसका उत्तर स्वयं ही देते हैं ; क्योंकि यह उत्तर हनुमानजी के मुख से शोभित नहीं होता। इसीलिये हनुमानजी चुप रहे। और प्रश्न का उत्तर भी यही यथार्थ है जो विभीषण जी अब कह रहे हैं। हनुमानजी उनके राम-प्राप्ति के द्वार हैं। (ख) अब भरोसा हुआ, *'तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं '* इस कारण भरोसा नहीं था, पर अब हुआ कि वे अवश्य मिलेंगे। 👉 _*'बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता'*_– अर्थात चाहे ब्रह्माण्ड भर खोज डालें तो भी नहीं मिलते और जब कृपा होती है तब घर बैठे संत मिल जाते हैं। ग्रन्थकार यहाँ उपदेश देते हैं कि जब इस तरह साधन करें जैसे विभीषणजी ने किया तब श्रीरामजी कृपा करेंगे और तब संत मिलेंगे। पुनः, हनुमानजी की कथा सुनकर विभीषणी ने जान लिया कि ये रामदूत हैं, इनके द्वारा मेरा कल्याण हो सकता है, अतः अपना दुख और लाचारी कहकर कहते हैं कि मैं निराश था कि इसी भाँति दीन-दशा में मेरा जीवन व्यतीत हो जायेगा, सरकार का दर्शन मेरे भाग्य में नहीं है, पर तुम सन्त हो, तुम्हारे दर्शन से भरोसा हुआ कि रामजी ने मुझ पर कृपा की। 🙏*'बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता'*🙏 श्रीरामचरितमानस के अनेक दोहे एवं चौपाइयांँ अथवा उनका एक भाग जनश्रुतियांँ बन चुके हैं। उपर्युक्त भाग उनमें से एक है। एस कभी सज्जन व्यक्ति के दर्शन होते हैं तो एकाएक मुँह से निकल जाता है– *'बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता ।'* 👉 _*जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा'*_ – मानस में *'रघुबीर'* शब्द पाँच प्रकार की वीरता के सम्बन्ध में प्रयुक्त हुआ है– (१) त्यागवीर– *पितु आयसु भूषन बसन तात तजे रघुबीर ।* *बिसमउ हरषु न हृदय कछु पहिरे बलकल चीर ॥'* (अयोध्याकाण्ड दोहा सं०१६५) (२) दयावीर– *'चरनकमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर ॥'* (बालकाण्ड दोहा सं० २११) (३) विद्यावीर– *'श्रीरघुबीरप्रताप तें सिंधु तरे पाषान ।* *ते मति मंद जो राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥'* (लंकाकाण्ड दोहा सं० ३) (जलपर पत्थर तैरना-तैराना एक विद्या है)। (४) पराक्रमवीर– *'सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीर ।* *हृदय न हरष बिषाद कछु बोले श्रीरघुबीर ॥'* (बालकाण्ड दोहा सं० २७०) (५) धर्मवीर– *'श्रवन सुजस सुनि आयउँ प्रभु भंजन भवभीर ।* *त्राहि त्राहि आरतिहरन सरन सुखद रघुबीर ॥* (सुन्दरकाण्ड दोहा सं० ४५) ये पाँचों वीरताएँ श्रीरामजी में हैं और में नहीं। इस प्रसंग में विभीषणजी एवं हनुमान्‌जी दोनों ने कृपा करने से (अर्थात् उनको दया-वीरतागुण को स्मरण करके) *'रघुबीर'* कहा, यथा– *'जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा'* और *'मोहू पर रघुबीर। कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन..।'* (दोहा सं० ७ में) दयावीर हैं, इसीलिये हमारे-से अधम पर कृपा की। *'दरसु हठि दीन्हा'*, यथा– *'एहि सन हठि करिहौं पहिचानी।'* ये हनुमानजी के ही वचन हैं। *'दरसु हठि दीन्हा'* इस पद से श्रीभगवत्‌ के अनुग्रहपूर्वक अपने भाग्य की प्रबलता दरसाते हुए परम भागवत श्रीहनुमानजी का अनुग्रह दरसाया। 🪷🪷 *सारांश* 🪷🪷 विभीषणजी को पहले श्रीरामजी के दर्शन नहीं हुए, पहले श्रीहनुमानजी मिले और उनसे प्रभु-कृपा का भरोसा मिला। यही भगवान् की कृपा का क्रम है— पहले विश्वास, फिर संत-संग और अन्त में भगवान् की प्राप्ति। अतः जीवन में यदि संतों का सान्निध्य प्राप्त हो जाए तो उसे प्रभु-कृपा का प्रथम संकेत मानकर विनम्रता, धैर्य और श्रद्धा के साथ साधना में दृढ़ रहना चाहिए। *'जहाँ संत आ गये, वहाँ समझो श्रीराम आने वाले हैं।'* विभीषणजी का जीवन इसी सत्य का साक्षात् प्रमाण है। *मुख्य संदेश:* संत-संग भगवान् की कृपा का आरम्भ है और प्रभु-प्राप्ति की ओर बढ़ाया गया उनका करुणामय प्रथम चरण है। श्रीहनुमानजी और विभीषणजी का यह संवाद हम सबको निराशा से आ

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Comments (1)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

Sep 15, 2026

शुभ मंगलवार जी 🚩 जय श्री राम जी 🙏 सुप्रभात जी 🙏🚩 हनुमान जी की कृपा से आपके सभी कार्य सफल हों जय सिया राम जी 🙏🚩 जय बजरंगबली जी ✨_*