
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
107 days ago
. "प्रेम की पराकाष्ठा" काम्यक वन में ललिता कुण्ड है जिसमें ललिताजी स्नान किया करती थी। और जब स्नान करती थी, और सदा राधा और कृष्ण को मिलन की चेष्टा करती थी। एक दिन ललिताजी बैठे-बैठे हार बनाती है और बनाकर तोड देती हैं। हर बार यही करती फिर बनाती और फिर तोड़ देती। फिर बनाती है फिर तोड़ देती है। नारदजी उपर से ये देखते है। तो आकर ललिता से पूछते हैं–‘आप ये क्या कर रही हो ?’ ललिताजी कहती हैं–‘मै कृष्ण के लिए हार बना रही हूँ।’ नारदजी ने कहा–‘हाँ वह तो मै देख ही रहा हूँ परन्तु आप बार-बार बनाती है और तोड़ देती है, ऐसा क्यों ?’ ललिताजी कहती हैं–‘नारदजी ! मुझे लगता है कि ये हार छोटा होगा कृष्ण को, तो मै तोड़ कर दूसरा बनाती हूँ, पर फिर लगता है कि ये बड़ा ना हो, तो उसे भी तोड देती हूँ। इसीलिए में बार-बार बनाकर तोडती हूँ।’ नारदजी कहते हैं–‘इससे तो अच्छा है कि भगवान को बुला लो और उनके सामने हार बना दो।’ अब नारदजी जाते हैं और बालकृष्ण को ले आते हैं। ललिताजी उनके नाप का हार बनाकर पहना देती हैं। परन्तु नारदजी तो पहले ही भगवान से कहकर आते हैं कि ‘आज मुझे ललिता-कृष्ण की लीला देखनी है। कृष्ण और ललिताजी को नायक-नायिका के रूप में देखना है। भगवान ललिताजी से कहते हैं–‘आओ ! मेरे साथ झूले पर बैठो।’ ललिताजी कहती हैं–‘अभी राधा जी आती होगीं, वे ही बैठेगीं।’ पर भगवान के जिद करने पर ललिताजी बैठ जाती हैं। क्योंकि गोपियों का उद्देश्य भगवान का सुख है। नारदजी दोनों को झूले में देखकर बडे प्रसन्न होते हैं, और वहाँ से सीधे राधा जी के पास आकर उनसे सामने ही गाने लगते हैं–‘कृष्ण-ललिता की जय हो !, कृष्ण-ललिता की जय हो !’ राधाजी कहती हैं–‘क्या बात है नारदजी ? आज कृष्ण-ललिता की जय कर रहे हैं।’ नारदजी कहते हैं–‘अहा ! क्या प्यारी जोडी है, झूले में ललिता और कृष्ण की। देखकर आनन्द आ गया।’ इतना कह कर नारदजी वहाँ से चले जाते हैं। जब राधा रानी ये बात सुनती है तो उनके मन में भी कृष्ण ललिता के झूलन दर्शन की इच्छा जाग्रत होती है। और वे तुरन्त ललिता कुण्ड की ओर चल देती हैं। ललिता कुण्ड में आकर देखती हैं कि कृष्ण ललिताजी के साथ झूला झूल रहे हैं। यह देख उनका मन बहुत हर्षित होता है। राधाजी को आता देख ललिताजी झूले से उतर आती हैं तथा राधाजी को कृष्ण के पास आसन ग्रहण कराती हैं और ललिता विशाखा सारी सखियाँ प्रिया-प्रियतम को झूलाती हैं। राधाजी कोई साधारण स्त्री नहीं हैं वे तो राधाजी की इच्छा होती है कि प्रियतम मेरे साथ-साथ ललिताजी को भी बिठाए झूले पर। राधाजी का इशारा पाकर प्रियतम अपनी दूसरी ओर ललिताजी को बिठा लेते हैं। अब एक ओर राधा जी बैठी है तो दूसरी ओर ललिताजी हैं। सभी सखियाँ झूलाती हैं। कुछ समय बाद राधा रानी की इच्छा होती है कि अन्य सभी सखियाँ भी प्रभु के साथ झूलन का आनन्द लें, ऐसा विचार करके वे स्वयं झूले से उतर जाती हैं और प्रियतम से अन्य सखियों के साथ झूलने को कहती हैं। प्रियतम ललिताजी के साथ दूसरी ओर विशाखाजी को स्थान देते हैं और झूलन फिर आरम्भ हो जाता है। राधाजी प्रियतम को सखियों के साथ झूलते देख आनन्द मग्न होती हैं। इसी तरह एक-एक करके सभी सखियाँ प्रियतम के साथ झूलन का आनन्द लेती हैं। ऐसी है प्रिया-प्रियतम के प्रेम की पराकाष्ठा। ० ० ० ॥जय जय श्री राधे॥ ********************************************

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