MyMandirInstall

वृंदावन में एक परम भक्त संत निवास करते थे, जिनका जीवन पूर्णतः राधा रानी की भक्ति में समर्पित था। उनका एक कड़ा नियम था कि वे प्रतिदिन श्रीमद्भगवद्गीता के एक अध्याय का पाठ करते थे और उसे अपनी आराध्य किशोरी जी (राधा रानी) के चरणों में अर्पित करते थे। वे अपनी कुटिया में ही एकांतवास करते हुए या तो गीता का पाठ करते या राधा नाम की माला जपते थे। उनके कुछ भक्त श्रद्धावश उन्हें भोजन दे जाते थे, जिससे उनका निर्वाह होता था। जैसे-जैसे समय बीता, संत वृद्ध होने लगे और उनकी आंखों की रोशनी कम होने लगी। एक दिन ऐसी स्थिति आई कि उन्हें गीता के अक्षर धुंधले दिखाई देने लगे और अंततः उनकी दृष्टि पूरी तरह चली गई। संत को अपनी आंखों की रोशनी जाने का इतना दुख नहीं था, जितना इस बात का शोक था कि अब वे राधा रानी को भगवद्गीता का पाठ कैसे सुना पाएंगे। वे व्याकुल होकर रोने लगे और प्रभु से प्रश्न करने लगे कि उनसे उनका यह सेवा का अधिकार क्यों छीन लिया गया। इसी मानसिक पीड़ा और विरह में उन्होंने उस दिन भोजन भी त्याग दिया। उसी शाम एक बालक उनकी कुटिया के द्वार पर आया और उनके लिए भोजन लेकर आया। संत ने उसे अपनी व्यथा बताते हुए भोजन करने से मना कर दिया और कहा कि बिना पाठ किए वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। बालक ने उनकी स्थिति पर सहानुभूति जताई और कुछ देर बाद वापस आने की बात कहकर चला गया। थोड़ी देर में वह बालक पुनः लौटा और संत के हाथ में एक पट्टी देते हुए कहा कि इसे अपनी आंखों पर बांध लें। संत ने सोचा कि शायद यह किसी वैद्य का पुत्र है और औषधि की पट्टी लेकर आया है, इसलिए उन्होंने श्रद्धापूर्वक वह पट्टी अपनी आंखों पर बांध ली। अगली सुबह जब वे सोकर उठे, तो एक चमत्कार हो चुका था—उन्हें सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह लौट आई थी। जब उन्होंने उस पट्टी को उतारकर देखा, तो उनके आश्चर्य और भक्ति का ठिकाना न रहा; उस पट्टी पर केवल 'राधा' नाम लिखा हुआ था। संत समझ गए कि उनकी सेवा और तड़प को देखकर स्वयं बांके बिहारी और राधा रानी ने उन्हें दर्शन और दृष्टि दान दिया है। उनकी वाणी और भक्ति और भी प्रगाढ़ हो गई क्योंकि अब उनके पास स्वयं ईश्वर द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि थी। राधे राधे

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!