
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
1 hours ago
*लंका युद्ध से पहले श्रीराम की पूरी सेना समुद्र तट के पास विश्राम कर रही थी। लंबी यात्रा के कारण सभी थक चुके थे। श्रीराम ने मुस्कुराकर हनुमान और लक्ष्मण से कहा, "सेना के लिए फल और भोजन लेकर आओ।"* *दोनों अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े।* *उधर रावण ने अपने एक मायावी राक्षस को आदेश दिया, "जाओ, राम और उनके सेवकों की परीक्षा लो।"* *राक्षस जंगल में पहुँचा और उसने स्वयं को श्रीराम जैसा बना लिया। जब हनुमान जी फल लेकर लौटे, तो उन्होंने सामने अपने प्रभु जैसा रूप देखा।* *नकली राम कठोर स्वर में बोला, "हनुमान! तुम यहाँ आराम से फल तोड़ रहे हो और मैं भूखा बैठा हूँ। जल्दी उस बेल को लाओ और मेरी आज्ञा मानो।"* *हनुमान जी कुछ क्षण शांत रहे। उन्होंने मन ही मन सोचा, "मेरे प्रभु की वाणी में प्रेम होता है, अहंकार नहीं।"* *वे बेल लेकर लौटे, लेकिन आज्ञा मानने के बजाय उसी बेल से उस नकली राम को एक विशाल वृक्ष से कसकर बाँध दिया।* *राक्षस क्रोध में चिल्लाया, "हनुमान! यह क्या कर रहे हो?"* *हनुमान जी हँसते हुए बोले, "मूर्ख! तू श्रीराम का रूप तो धारण कर सकता है, लेकिन उनके प्रेम, करुणा और विनम्रता की नकल नहीं कर सकता। मेरे प्रभु कभी अपने भक्त से घमंड से बात नहीं करते।"* *इतना सुनते ही राक्षस अपने असली भयानक रूप में आ गया, लेकिन तब तक वह बँध चुका था।* *पूरी रात वह छूटने की कोशिश करता रहा, पर सफल नहीं हुआ।* *थककर उसने पहली बार सच्चे मन से पुकारा, "जय श्रीराम!"* *जैसे ही उसके मुख से श्रद्धा के साथ प्रभु का नाम निकला, बेल अपने आप खुल गई।* *राक्षस आश्चर्यचकित रह गया। उसे समझ आ गया कि श्रीराम के नाम की शक्ति किसी भी बंधन से बड़ी है।* *वह वहाँ से चला गया, और वृक्ष की ऊँची शाखा पर बैठे हनुमान जी मुस्कुराकर बोले, "प्रभु का नाम केवल भक्तों का ही नहीं, भटके हुए का भी उद्धार कर देता है।"*

Comments (1)

R k jangid phulera Jaipur
Sep 29, 2026
जय सियाराम जी 🌹🙏
