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SHREE SHARMA

462 days ago

. “ज्ञानी का अवरोध” जहाँ जीवन में उतरी हुई कोई चीज होती है, वहाँ वह चीज तत्काल समझ में आ जाती है। इसके विपरीत जब हम केवल कहते हैं और वह बात जीवन में उतरी नहीं है तो मैं सत्य कहता हूँ कि इससे कोई लाभ नहीं होता है। एक बार व्यासजी महाराज ने शुकदेवजी को उपदेश दिया, किन्तु उनकी समझ में वह बात नहीं आयी तो पिता ने कहा कि तुम महाराज जनक के पास जाओ, वे उपदेश देंगे। शुकदेवजी जनक के द्वारपर पहुँचे। जनकजी जान गये थे कि शुकदेव आ रहे हैं। उन्होंने बाहर पहरेदारों को पहले ही खबर करवा दी कि उन्हें अंदर मत आने देना। शुकदेवमुनि द्वारपर आ गये और अंदर जाने लगे तो पहरेदारों ने कहा–‘महाराज ! रुकिये, अंदर जाने की आज्ञा नहीं है।’ शुकदेवजी खड़े हो गये। न स्वागत किया, न सत्कार किया और न आसन दिया गया। गुप्तचर देखते रहे कि इनके मुख की आकृति कैसी बनती है। आकृति-विज्ञान वालों ने देखा कि मुख जैसा-का-तैसा है। कोई भी विकार का भाव नहीं है। महल में निर्विकारता की खबर दी गयी। इस पर जनकजी ने कहा–‘अच्छा, अब उनको ऐसे विलास-कानून में भेज दो, जहाँ विलास की सारी सामग्री और सारे-के-सारे विलास के साधन मौजूद हों।’ ऐसा ही किया गया। जहाँ पर विकार पैदा करने वाली सारी सामग्रियाँ उपस्थित थीं, जहाँ पर इन्द्रियों के सारे विषय विद्यमान थे, ऐसे स्थान पर उन्हें भेज दिया गया। वस्त्रालंकारों से सुसज्जित पचास तरुणी स्त्रियों को उनकी सेवा में लगा दिया गया। शुकदेवजी तो गर्भज्ञानी थे। जो बाहर थे, वही अंदर रहे। कोई परिवर्तन नहीं हुआ। जैसे-के-तैसे रहे। महल में महाराज के पास खबर पहुँची कि वे तो जैसे बाहर हैं वैसे ही अन्दर भी हैं। जनकजी ने कहा–‘अब उन्हें ससम्मान यहाँ ले आइये।’ जब वे पहुँचे तो जनक महाराज स्वयं आदरपूर्वक उन्हें ले गये। महल में ले जाकर योग्य आसन दिया, स्थान दिया, पूजा की, अर्घ्य दिया और पूछा–‘महाराज ! कैसे पधारे ?’ शुकदेवजी ने कहा–‘पिताजी ने आज्ञा दी है। आपके पास बोध प्राप्त करने आया हूँ।’ शुकदेव की तो परीक्षा हो चुकी थी- मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। (गीता १४। २५) मान-अपमान में तुल्य रहना बड़ी कठिन बात है। जरा-सी बात में हम लोगों का मान-भंग हो जाता हैं। आज प्रेम से भी अनजान में भी कहीं कोई अगर जरा-सी अपने मन की कल्पना में रूक्षता हो जाय तो हमें लगता है कि हमारा अपमान कर दिया। गुरुजी ने अपमान कर दिया, हमारे भाई ने अपमान कर दिया, पिता ने-पति ने अपमान कर दिया। न मालूम क्या-क्या अपमान की कल्पना करके मन में मनुष्य दु:खी होता है। कितना अपमान ! जनकजी के यहाँ शुकदेव मुनि से बैठने के लिये भी नहीं कहा गया। जल के लिये भी नहीं पूछा गया। कुछ भी नहीं कहा गया। विलास-भवन में सारी सामग्रियाँ उनके विलास के लिये मौजूद! परन्तु कुछ भी विकार नहीं आया। परीक्षा हो गयी कि ये केवल मौखिक वेदान्ती नहीं हैं। ये केवल मौखिक ज्ञानी नहीं हैं। ज्ञान इनके जीवन में उतर आया है। जो ज्ञान का परिणाम होता है वह इनके जीवन में मूर्तिमान् है। तब जनक ने कहा–‘महाराज ! आप जो यह मानते हैं कि मुझे बोध नहीं है, ज्ञान नहीं है, इसको छोड़ दीजिये। आप ज्ञानवान् हैं, परन्तु आपने जो मान रखा है कि अभी हमें बोध प्राप्त करना अवशेष है, बोध नहीं है, बस यही अवरोध है। इसको छोड़ दीजिये, आप बोधवान् हैं।’ वह तो वैसे भी छूटा हुआ था ही। जनकजी की यह बात शुकदेवजी को तत्काल समझ में आ गयी। ० ० ० - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) 'सरस प्रसंग' ॥जय जय श्री राधे कृष्ण ॥ ****************************************

Comments (1)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

May 26, 2025

Radhey Radhey ❤️🙏🙏