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16.4.2026 सांसारिक भाषा में ऐसा बोला जाता है, कि *"जब मन के विचारों में और बुद्धि के विचारों में टकराव हो जाए, तो मन की बात नहीं सुननी चाहिए, बुद्धि की बात सुननी चाहिए। उस बात पर आचरण करना चाहिए।"* यह तो केवल मोटी भाषा है, वास्तविक नहीं। क्योंकि मन भी जड़ पदार्थ है, और बुद्धि भी। *"जड़ पदार्थ में कोई विचार नहीं होता। न वह कोई विचार प्रस्तुत करता है।" "विचार तो चेतन वस्तु का गुण है, जड़ का नहीं। इसलिए जिसे लोग मन का विचार कहते हैं, वास्तव में वह आत्मा का विचार है। और जिसे बुद्धि का विचार कहते हैं, वह ईश्वर का विचार है। क्योंकि आत्मा और ईश्वर दोनों चेतन हैं।"* कहने का तात्पर्य यह हुआ, कि *"जो विचारों में टकराव है, वह मन और बुद्धि के विचारों में नहीं है, वास्तव में वह आत्मा और ईश्वर के विचारों में टकराव है।"* अब मन के स्थान पर आत्मा को रख दीजिए, और बुद्धि के स्थान पर ईश्वर को। अब इस बात को फिर से पढ़िए। *"यदि आत्मा और ईश्वर के विचारों में टकराव हो जाए, तो ईश्वर का विचार सुनना एवं मानना चाहिए, उस पर आचरण करना चाहिए, आत्मा के विचारों पर नहीं।"* *"क्योंकि ईश्वर सर्वथा पवित्र और शुद्ध ज्ञान वाला है। उसका सुझाव सदा सही होता है। उस पर आचरण करना चाहिए। वही लाभदायक और सुखदायक होता है।" "और आत्मा में अच्छे बुरे दोनों तरह के संस्कार हैं। कभी तो आत्मा अच्छे विचार उठाता है, और कभी बुरे। इसलिए आत्मा के अच्छे विचारों पर तो आचरण करना चाहिए, परंतु बुरे विचारों पर आचरण नहीं करना चाहिए। तो सारी बात का सार यह हुआ, कि "यदि आत्मा अच्छा विचार उठाए, और ईश्वर भी उसका समर्थन करे, तो ईश्वर के सुझाव का पालन करें, वही आपका कल्याण करेगा।"* ईश्वर के सुझाव की पहचान यह है, कि *"जब आप कोई योजना बनाते हैं, और यदि उस समय आपके अंदर भय शंका लज्जा की अनुभूति होती है, तो समझ लीजिए, यह काम ग़लत है। इस पर आचरण नहीं करना चाहिए, तथा यह आत्मा का विचार है।"* *"और यदि किसी योजना को बनाते समय अंदर से आपको आनन्द उत्साह निर्भयता की अनुभूति होती है, तो समझ लीजिए, यह अच्छा काम है, और यह ईश्वर का सुझाव है, कि "आप इस काम को कर लें।" "अतः ईश्वर के विचार पर ही आचरण करें आत्मा के ग़लत विचार पर नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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Comments (2)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

Apr 16, 2026

राधे राधे जी 🙏