
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
177 days ago
रामदूत मैं मातु जानकी, सत्य शपथ करुनानिधान की। यह पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड से ली गई हैं। जब हनुमान जी लंका में माता सीता से पहली बार मिलते हैं, तब सीता जी को उनकी बातों पर पूर्ण विश्वास नहीं होता। हनुमान जी अपनी सत्यता सिद्ध करने के लिए और सीता जी का संशय दूर करने के लिए भगवान श्री राम की शपथ लेते हुए यह वचन कहते हैं: > "रामदूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥" > अर्थ एवं संदर्भ * भावार्थ: "हे माता जानकी! मैं भगवान श्री राम का दूत हूँ। मैं करुणा के सागर (करुनानिधान) प्रभु श्री राम की सच्ची शपथ खाकर कहता हूँ (कि मैं उनका ही सेवक हूँ)।" * प्रसंग: हनुमान जी ने जब लंका में अशोक वाटिका के नीचे सीता जी को प्रभु की मुद्रिका (अंगूठी) दी, तब माता सीता को संशय हुआ कि कहीं यह रावण की कोई माया तो नहीं। तब अपनी अटूट भक्ति और सत्यता को प्रमाणित करने के लिए हनुमान जी ने यह सुंदर पंक्तियाँ कहीं। आपके लिए आज का विचार सत्य और अटूट विश्वास ही वह शक्ति है जो बड़े से बड़े संकट में भी मार्ग प्रशस्त करती है। हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा और भक्ति ही सबसे बड़ा धर्म है। जय सिया राम जी 🙏💫

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