
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
17 hours ago
*मोरध्वज की कहानी कैसे अपने ही पुत्र को माता पिता ने जिंदा आरी से काट शेर को खिलाया?* *महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात अर्जुन को वहम हो गया की वो श्रीकृष्ण के सर्वश्रेष्ठ भक्त है, अर्जुन सोचते की कन्हैया ने मेरा रथ चलाया, मेरे साथ रहे इसलिए में भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हूँ। अर्जुन को क्या पता था की वो केवल भगवान के धर्म की स्थापना का जरिया था। फिर भगवान ने उसका गर्व तोड़ने के लिए उसे एक परीक्षा का गवाह बनाने के लिए अपने साथ ले गए।* *दोस्तों आज की यह कहानी एक ऐसी परम भक्त के परीक्षा की है जिन्होंने अपने ही बेटे को एक साधु के कहने मात्र से जिंदा काट कर शेर को खिला देता है।* *महाभारत युद्ध समाप्त होने के पश्चात श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों जोगियों का वेश बनाकर वन से एक शेर पकड़कर भगवान विष्णु के परम-भक्त राजा मोरध्वज के द्वार पर पहुँच जाते है। दोस्तो राजा मोरध्वज बहुत ही दानी और आवभगत वाले थे अपने दर पे आये किसी को भी वो खाली हाथ और बिना भोज के अपने दरबार से जाने नहीं देते थे।* *दो साधु एक सिंह के साथ दरबार पर आये है ये जानकर राजा नंगे पांव दौड़के द्वार पर गए और भगवान के तेज से नतमस्तक हो आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा। भगवान श्रीकृष्ण ने मोरध्वज से कहा की हम मेजबानी तब ही स्वीकार करेंगे जब राजा उनकी शर्त मानें, राजा ने जोश से कहा आप जो भी कहेंगे मैं तैयार हूँ।* *भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, हम तो ब्राह्मण है हमें कुछ भी खिला देना हम खा लेंगे। पर ये सिंह नरभक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथों से मारकर इसे खिला सको तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे। भगवान की शर्त सुन मोरध्वज के होश उड़ गए, फिर भी राजा अपना आतिथ्य-धर्म नहीं छोडना चाहता था। उसने भगवान से कहा प्रभु ! मुझे मंजूर है पर एक बार में अपनी पत्नी से पूछ लूँ ।* *भगवान से आज्ञा पाकर राजा मोरध्वज महल में गया तो राजा का उतरा हुआ मुख देख कर पतिव्रता रानी ने राजा से मुंह उतरा और उदास मुख का कारण पूछा। राजा ने जब सारा हाल रानी बताया तो उनके आँखों से अश्रु की धारा बहने लगे। फिर भी वो अभिमान से राजा से बोली की आपकी आन पर मैं अपने सैंकड़ों पुत्र कुर्बान कर सकती हूँ। आप साधुओ को आदरपूर्वक अंदर ले आइये।* *अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- माधव ! ये क्या माजरा है ? आप ने ये क्या मांग लिया ? श्रीकृष्ण बोले -अर्जुन तुम देखते जाओ और चुप रहो।* *राजा तीनो को अंदर ले आये और भोजन की तैयारी शुरू की। भगवान को छप्पन भोग परोसा गया पर अर्जुन के गले से एक भी निवाला उत्तर नहीं रहा था। राजा ने स्वयं जाकर पुत्र को तैयार किया। पुत्र तीन साल का था नाम था उसका रतन कँवर, वो भी माता पिता का सच्चा भक्त था, उसने भी हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए परंतु उफ़ ना की ।* *राजा रानी ने अपने हाथो में आरी लेकर पुत्र के दो टुकड़े किये और सिंह को परोस दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने भोजन ग्रहण किया। पर दोस्तों जब रानी ने अपने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वे अपने आंसू रोक न पाई। भगवान श्रीकृष्ण इस बात पर गुस्सा हो गए की लड़के का एक हिस्सा कैसे बच गया? भगवान श्रीकृष्ण रुष्ट होकर वहा से जाने लगे तभी श्रीकृष्ण को जाते देख राजा और रानी उसे रुकने की मिन्नतें करने लगे।* *अर्जुन को अहसास हो गया था की भगवान श्रीकृष्ण मेरे ही गर्व को तोड़ने के लिए ये सब कर रहे है। वे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर उनसे विनती करने लगा और कहने लगा की आप ने मेरे झूठे मान को तोड़ दिया है। राजा और रानी के बेटे को उनके ही हाथो से मरवा दिया* *और अब रूठ के जा रहे हो, ये उचित नही है। प्रभु ! मुझे माफ़ करो और भक्त का कल्याण करो।* *तब केशव ने अर्जुन का घमंड टूटा जान रानी से कहा की वो अपने पुत्र को आवाज दे। रानी ने सोचा पुत्र तो मर चुका है, अब इसका क्या मतलब !! पर साधुओं की आज्ञा मानकर उसने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई।* *दोस्तों कुछ ही क्षणों में चमत्कार हो गया । मृत रतन कंवर जिसका शरीर शेर ने खा लिया था, वो हँसते हुए आकर अपनी माँ से लिपट गया। भगवान श्रीकृष्ण ने मोरध्वज और उनकी रानी को अपने विराट स्वरुप का दर्शन कराया। पूरे दरबार में वासुदेव श्रीकृष्ण की जय जय कार गूंजने लगी।* *भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जान मोरध्वज की ऑंखें भर आई और वो बुरी तरह बिलखने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने वरदान मांगने को कहा तो राजा और रानी ने कहा भगवान हमे एक ही वर दो की अपने भक्त की कभी ऐसी कठोर परीक्षा न ले, जैसे आप ने हमारी ली है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने तथास्तु कहकर उसको आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष दिया।* *।। जय श्री कृष्णा ।।*

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