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श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार पञ्चदश अध्याय: पुरुषोत्तम योग (परम पुरुष का बोध) बोले माधव, "पार्थ! सुन, इक वृक्ष बड़ा अनूप, जड़ें ऊपर, शाखा नीचे, माया का यह रूप। 'अश्वत्थ' इसे कहते सब, वेद जिसके हैं पात, जो इस वृक्ष को मूल से जाने, वही तत्ववेत्ता तात।" "गुणों के जल से सींची इसकी, शाखाएँ चहुँ ओर, विषय-भोग की कोपलें फूटें, कर्मों की है डोर। नीचे भी जड़ें फैली हैं, मनुष्य लोक के माँझ, अहंकार और वासनाओं से, फँसा रहे दिन-साँझ।" ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ (१५.१) ऊपर जड़, नीचे शाखा, अश्वत्थ वृक्ष है नाम। वेद पत्र जो जान ले, वह ज्ञाता निष्काम॥ "असंस्कार के शस्त्र से, इस वृक्ष को तू काट, वैराग्य की धार प्रबल कर, तज दे सारा ठाट। खोज उस परम पद को, जहाँ से न लौटना होय, उस आदि पुरुष की शरण जा, जहाँ मोह न व्यापे कोय।" "न वहाँ सूर्य प्रकाशता, न शशि, न पावक (अग्नि) की जोत, वह मेरा परम धाम है, सब ज्ञान का जो है स्रोत। मेरा ही अंश जीव बन, प्रकृति में करता वास, मन और इंद्रियों को खींचता, जैसे फूलों का सुवास।" न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ (१५.६) सूर्य-शशि-पावक जहाँ, फीके पड़ें सब साज। जहाँ से कभी न लौटना, वह मेरा परम स्वराज॥ "मैं ही जठराग्नि बनकर, सबके तन में वास करूँ, चार प्रकार के अन्न को, मैं ही पचाकर शांत रहूँ। हृदय में सबके स्थित मैं, स्मृति-ज्ञान-विमोह (विस्मृति) भी मैं, वेदों का ज्ञाता-कर्ता, और वेदों का अर्थ भी मैं।" "क्षर और अक्षर से ऊपर, मैं 'पुरुषोत्तम' कहलाऊँ, जो जान ले मुझे तत्व से, उसे सब ज्ञान सिखाऊँ। यह परम गोपनीय शास्त्र है, जो मैंने तुझे सुनाया, कृतकृत्य हो जाए मनुज, जिसने इसे मन में बसाया।" संसार वृक्ष को काट कर, मधु करो गोविंद का ध्यान। कृष्ण शरण में जाय कर, करो अपना कल्याण॥ जीवन सूत्र: "संसार से वैराग्य ही परमात्मा से मिलन का मार्ग है।" यह संसार एक उल्टा वृक्ष है, जिसकी जड़ें भगवान हैं। जब हम बाहरी शाखाओं (विषय-भोगों) में उलझने के बजाय अपनी जड़ों (ईश्वर) की ओर मुड़ते हैं, तभी हमें सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।

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Comments (2)

vijay kushwaha

vijay kushwaha

Mar 17, 2026

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः