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24.5.2026 संसार में देखा जाता है, कि अनेक बार जो भाषा बोली जाती है, वहां उन शब्दों का सीधा-साधा = मुख्य अर्थ लिया जाता है। साहित्य की भाषा में उसे कहते हैं 'अभिधा वृत्ति।' जैसे किसी ने कहा कि *"मैं आज से व्यायाम आरंभ करूंगा."* तो यहां इन शब्दों का सीधा-सीधा अर्थ लिया जाएगा, कि *"आज से वह व्यक्ति आलस्य को त्याग कर शारीरिक व्यायाम आरंभ करेगा।"* कहीं शब्दों का सीधा-सीधा = मुख्य अर्थ नहीं लिया जाता, बल्कि थोड़ा बदलकर अर्थ लिया जाता है। उसे कहते हैं 'लक्षणा वृत्ति।' जैसे *"दुश्मन के दांत खट्टे करना, आसमान के तारे तोड़ लाना।"* यहां इन शब्दों का सीधा-सीधा अर्थ नहीं लिया जाता। बल्कि यह मुहावरे की भाषा है। इसका अभिप्राय लेना होता है। पहले वाक्य का अर्थ है *"शत्रु को हरा देना। दूसरे का अर्थ है, कठिन कार्य को करना।"* इसी प्रकार से कहीं कहीं पर शब्द कुछ और होते हैं, और उनका अभिप्राय एक अन्य ढंग से लिया जाता है। उसको कहते हैं 'व्यंजना वृत्ति।' जैसे किसी ने दूसरे व्यक्ति से कहा कि *"वर्षा होने वाली है."* इसका तात्पर्य केवल इतना नहीं था कि दूसरे व्यक्ति को वर्षा की सूचना देना। इसका अभिप्राय यह था कि *"आपने जो छत पर कपड़े सुखाए थे, वे कहीं भीग न जाएं, इसलिए आप उन कपड़ों को उतार लाइए। क्योंकि वर्षा होने की तैयारी है।"* कहने का तात्पर्य यह है, कि *"वक्ता ने जिस अभिप्राय से अपनी बात कही हो, उसकी बात से वही अभिप्राय लेवें। उसके साथ छल का प्रयोग न करें।" "जब लोग उसके शब्दों पर ठीक-ठीक ध्यान नहीं देते और छल का प्रयोग करते हैं, तब व्यवहार में दोष आते हैं। उससे आपस के संबंध बिगड़ जाते हैं।"* अतः परस्पर मधुर संबंध बनाए रखने का यह उपाय है, कि *"दूसरे व्यक्ति के 'शब्दों पर ध्यान कम दें', और उसकी भावनाओं तथा उसके अभिप्राय पर अधिक ध्यान दें। व्यर्थ में दूसरे व्यक्ति के साथ छल का प्रयोग करके उसका व्यर्थ खंडन न करें। इससे आप को कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि आपका उसके साथ संबंध बिगड़ेगा।"* ध्यान देने की दूसरी बात यह भी है, कि *"व्यवहार में जब लोग आपस में बातचीत करते हैं, तो कहीं प्रेम से मीठी भाषा बोलते हैं, और कहीं कठोर भाषा भी बोलते हैं। तो "व्यवहार में यह भी सावधानी रखें, कि मीठी भाषा बोलें, कठोर भाषा न बोलें। इससे भी आपके संबंध मधुर बने रहेंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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