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SHREE SHARMA

334 days ago

. चोरी की सजा एक साधु थे एक बार वह काफी दूर अपने मित्र साधु से मिलने के लिए गए। जब वे अपने मित्र साधु के आश्रम में पहुँचे तो उस समय आश्रम में कोई भी नहीं था। जो साधु अपने मित्र से मिलने आए थे वह काफी लम्बी यात्रा करके आए थे इस कारण वह काफी थक गए थे और उन्हें भूख भी लगी थी। काफी देर इन्तजार करने के बाद भी जब आश्रम में कोई नहीं आया तो उन्होंने पास के पपीते के वृक्ष से पपीता तोड़कर खा लिया। थोड़ी देर बाद जब दूसरे साधु अपने शिष्यों के साथ गङ्गा स्नान करके वापस आए तो वह अपने मित्र से मिलकर काफी प्रसन्न हुए और अध्यात्म की बातें हुई। अचानक उनकी नजर पहले वाले साधु के खाए हुए पपीते के छिलकों पर पड़ी। जब बात हुई तो साधु ने बताया कि मुझे भूख लगी थी इसलिए मैंने पपीता खा लिया। दूसरे साधु ने कहा–'मित्र तुमने यह पपीता बिना किसी से पूछे खाया तो क्या तुम समझते हो कि इसका क्या मतलब हुआ।' पहले साधु बोले–'किसी से बिना पूछे और किसी से पर्दे से कोई चीज लेना चोरी कहलाता है।' तब दूसरे साधु ने कहा–'हे मित्र इसका प्रायश्चित करो नहीं तो यह कर्म अगले जन्म में आपको परेशान करेगा।' यह सुनकर पहला साधु राजा के दरबार में गया और राजा से पूछा–'हे राजन आपके राज्य में चोरी करने की क्या सजा है।' राजा ने पूछा–'क्या बात है ?' पहले साधु ने सारा वृत्तांत सुनाया तो राजा ने कहा–'इसमें कोई बड़ी बात नहीं है वह था तो आपका मित्र ही।' साधु ने कहा–'हे राजन हम साधु महात्मा किसी भी ऐसे कर्म का उदय नहीं करते जिससे हमें अगले जन्म के बन्धन में बंधना पड़े। हमारा हर कर्म मुक्ति के लिए होता है। अतः आप यह बताएं कि आपके राज्य में चोरी करने की क्या सजा होती है ?' राजा ने कहा–'हे साधु हमारे राज्य में चोरी करने वाले के हाथ काट दिए जाते हैं।' तब उस साधु ने कहा–'महाराज' कृपया करके मुझे वही सजा दीजिए।' बार-बार ना करने पर भी राजा को इस बात की सजा देनी पड़ी। हाथ कटने के बाद जब वह साधु अपने मित्र के आश्रम में पहुँचा तो वह मित्र काफी प्रसन्न हुआ और अपने साधु मित्र से कहा कि जाकर गङ्गा में स्नान करके आओ। वह साधु शीघ्र ही गंगा में स्नान करने चला गया और जब गंगा में स्नान करके बाहर निकला तो वह पहले की तरह स्वस्थ था। खुशी खुशी वह आश्रम में पहुँचा और अपने मित्र से मिला। साधु अपने मित्र से कहने लगा–'हे मित्र आज तुमने मुझे कर्म बन्धन से बचा लिया। मैंने अपने किए हुए पाप का दण्ड इसी जन्म में भोगकर अपने अगले जन्म को अर्थात अपने मोक्ष के मार्ग को सार्थक कर लिया।' इसी तरह जब कोई मनुष्य सांसारिक दुखों से दुखी होता है तो वह अपने शरीर को ऐसी यात्नाओं को देकर उस कर्मफल के भोग से निवृत होने की कोशिश करता है ० ० ० "जय जय श्री राधे" ********************************************

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