
SHREE SHARMA
37 days ago
जब करुणा ने भक्ति के आगे घुटने टेके गंगा की अविरल धारा के तट पर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मणजी खड़े थे। वनवास की यात्रा का यह पहला पड़ाव था। लक्ष्मणजी ने तट पर खड़ी एक छोटी सी नौका के स्वामी को आवाज दी, "हे केवट! क्या तुम हमें उस पार ले चलोगे?" केवट ने अपनी नौका से ही उत्तर दिया, "राजकुमार! मैं आपको अपनी नाव पर बिठा तो लूँ, पर मुझे डर है। मैंने सुना है कि आपके चरणों की धूल में कोई चमत्कारी जड़ी-बूटी है। पत्थर की अहिल्या तो नारी बन गई, मेरी नौका तो काठ (लकड़ी) की है। यदि यह भी नारी बन गई, तो मैं एक साथ दो पत्नियों का पेट कैसे पालूँगा? और मेरी आजीविका का यह एकमात्र साधन भी छिन जाएगा!" भक्ति की अनोखी शर्त लक्ष्मणजी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, किंतु प्रभु श्री राम केवट के हृदय की निश्छल प्रीति को समझ गए। केवट ने अपनी शर्त रखी, "यदि आप मेरी नौका पर बैठना चाहते हैं, तो पहले मुझे आपके चरण पखारने की अनुमति दें। जब धूल साफ हो जाएगी, तभी मेरी नैया सुरक्षित रहेगी।" रामजी मंद-मंद मुस्कुराए। केवट एक काठ का कठौता लेकर आया। उस समय एक अद्भुत दृश्य उपस्थित हुआ: * लक्ष्मणजी (शेषनाग के अवतार) प्रभु के दाहिने चरण के रक्षक थे। * माता सीता (लक्ष्मीजी) वाम चरण की सेवा में थीं। * परंतु उस दिन केवट सबसे भाग्यशाली सिद्ध हुआ, जिसने एक साथ प्रभु के दोनों चरणों को अपने हाथों में लेकर गंगाजल से धोया। > पौराणिक रहस्य: कहा जाता है कि पूर्व जन्म में यह केवट क्षीर सागर का एक कछुआ (कच्छप) था, जो नारायण के चरण स्पर्श करना चाहता था, किंतु शेषनाग और लक्ष्मीजी के कड़े पहरे के कारण सफल न हो सका। आज समय का चक्र घूमा और वही केवट दोनों रक्षकों के सामने अपने आराध्य के चरणों की सेवा कर रहा था। नि:स्वार्थ प्रेम और साम्यता नदी पार करने के बाद, प्रभु के पास केवट को देने के लिए कुछ न था। माता सीता ने अपनी बहुमूल्य मुद्रिका (अंगूठी) रामजी को दी ताकि वे उसे 'उतराई' के रूप में दे सकें। जब रामजी ने अंगूठी बढ़ाई, तो केवट की आँखों में आँसू आ गए। उसने लेने से इनकार कर दिया। लक्ष्मणजी के आग्रह करने पर केवट ने एक ऐसी बात कही जिसने सबको निरुत्तर कर दिया: केवट बोला: "हे नाथ! हम तो एक ही व्यवसाय के भाई-बंधु हैं। एक जात वाला अपनी ही जाति के भाई से मजदूरी नहीं लेता।" लक्ष्मणजी ने विस्मित होकर पूछा, "हम और तुम एक ही जाति के कैसे?" केवट ने सरलता से उत्तर दिया: "महाराज, मैं छोटी नदी पार कराता हूँ, इसलिए ''केवट" हूँ। आप भवसागर पार कराते हैं, इसलिए आप 'बड़े केवट' हैं। आज मैंने आपको पार उतारा है, जब मेरा समय आए, तो आप मुझे इस संसार-सागर से पार उतार दीजिएगा। यही मेरी उतराई है।" प्रभु राम ने गद्गद होकर केवट को गले लगा लिया और उसे वह वरदान दिया जो बड़े-बड़े योगियों को भी दुर्लभ है।

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