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पंचायतन शिला (Panchayatan Shila) हिंदू धर्म की 'स्मार्त परंपरा' में पूजी जाने वाली पाँच पवित्र प्राकृतिक शिलाओं (पत्थरों) का समूह है। यह पूजा पद्धति आदि शंकराचार्य द्वारा लोकप्रिय बनाई गई थी ताकि विभिन्न मतों (शैव, वैष्णव, शाक्त आदि) के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके। इसमें मूर्ति के बजाय प्राकृतिक रूप से नदियों से प्राप्त दिव्य पत्थरों की पूजा की जाती है। 1. पाँच शिलाएँ और उनके देवता इन पाँचों शिलाओं का संबंध भारत की पवित्र नदियों और विशिष्ट देवताओं से है: | शिला का नाम | प्राप्त स्थल (नदी) | प्रतीक देवता | |---|---|---| | शालिग्राम | गण्डकी नदी (नेपाल) | भगवान विष्णु | | बाणलिंग | नर्मदा नदी (मध्य प्रदेश) | भगवान शिव | | स्वर्णमुखी शिला | स्वर्णमुखी नदी (आंध्र प्रदेश) | देवी दुर्गा (शक्ति) | | शोणभद्र शिला | सोन नदी (मध्य प्रदेश/बिहार) | भगवान गणेश | | सूर्यकांत शिला | विभिन्न पर्वत/नदियाँ | भगवान सूर्य | 2. पंचायतन पूजा का विन्यास (Arrangement) पंचायतन शिला पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसमें भक्त अपने 'इष्टदेव' (प्रमुख देवता) के अनुसार पत्थरों का क्रम बदल सकता है। जो मुख्य देवता होते हैं, उनकी शिला केंद्र में रखी जाती है और अन्य चार शिलाएँ चारों कोनों पर। * विष्णु पंचायतन: विष्णु केंद्र में, बाकी चारों ओर। * शिव पंचायतन: शिव (बाणलिंग) केंद्र में, बाकी चारों ओर। * गणेश/सूर्य/देवी पंचायतन: इसी तरह उनके केंद्र में होने पर क्रम बदल जाता है। 3. इसका आध्यात्मिक महत्व * निराकार से साकार: ये शिलाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं हैं, बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं। इन्हें साक्षात् ईश्वर का स्वरूप माना जाता है। * एकता का प्रतीक: यह पूजा सिखाती है कि शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश एक ही परम सत्ता के विभिन्न रूप हैं। * सरलता: इसमें बड़ी मूर्तियों या मंदिर की आवश्यकता नहीं होती; एक छोटे से थाल (पात्र) में इन पाँचों शिलाओं को स्थापित कर घर में पूजा की जा सकती है। > विशेष नोट: पंचायतन शिलाओं में शालिग्राम और बाणलिंग (नर्मदेश्वर) सबसे अधिक प्रचलित हैं। शालिग्राम काले रंग के और चक्र के निशान वाले होते हैं, जबकि बाणलिंग चिकने और अंडे के आकार के होते हैं। >

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