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2.4.2026 प्रायः सभी लोग अपने जीवन में जो जो कार्य करते हैं, उन सब कार्यों का अंतिम निर्णय वे स्वयं ही लेते हैं। इसका अर्थ यह हुआ, कि *"यदि उन्हें किसी कार्य में सफलता मिली, तो उसका यश उन्हीं को मिलना चाहिए। और यदि किसी कार्य में वे असफल हुए, तो दोष भी उन्हीं का माना जाना चाहिए। यही न्याय है।"* और ऐसा देखा भी जाता है, कि *"कोई भी व्यक्ति 100% दूसरे के निर्णय पर आचरण नहीं करता। क्योंकि दूसरा व्यक्ति बहुत ऊंचे आदर्शों की बातें करता है, जबकि प्रत्येक व्यक्ति का इतना सामर्थ्य नहीं होता, कि वह सभी ऊंचे आदर्शों का पालन कर सके। उसकी बुद्धि और क्षमताएं सीमित होती हैं। इसलिए वह अपनी बुद्धि और अपनी क्षमता को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। जब सारे अंतिम निर्णय उस के अपने ही होते हैं, तो सफलता और असफलता का यश और दोष भी उसी के सिर पर आएगा।"* परन्तु संसार में कुछ लोग ऐसे देखे जाते हैं, यदि उन्हें किसी कार्य में सफलता मिल जाए, तो वे कहते हैं, ""देखा! मैंने कितना अच्छा निर्णय लिया और कितनी अच्छी सफलता मिली। मेरी बुद्धि बहुत अच्छी है।"* और जब किसी कार्य में उन्हें असफलता मिलती है, तब वे सारा दोष दूसरों के सिर पर डाल देते हैं। कि *"उस व्यक्ति ने मुझे ऐसी सलाह दी थी, जिसके कारण मैं इस कार्य में असफल हो गया। वह व्यक्ति बड़ा दुर्बुद्धि है।" "तो ऐसा करना और कहना मूर्खता भी है और दुष्टता भी। क्योंकि यह न्याय नहीं है, अन्याय है।" "जब आप सफलता का श्रेय स्वयं लेते हैं, तो असफलता का दोष भी तो आपके ही सिर पर आएगा न!"* *"इसलिए सबको अपनी मूर्खता और दुष्टता को छोड़ कर, सभ्यता और बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए। इसी में सबका कल्याण है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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