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जय श्री कृष्णा जी 🙏 1. जो हमेशा मन में शंका रखते हैं, उन्हें संसार में कहीं पर भी चैन नहीं मिलता है। *गीता अध्याय 4, श्लोक 40 - `संशयात्मा विनश्यति`* श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन! जिसके मन में हर बात पर शक है — ईश्वर पर शक, अपने आप पर शक, अपने कर्म पर शक — वह कभी शांति नहीं पा सकता। शंका वाला व्यक्ति न इस लोक का रहता है न परलोक का। इसलिए जीवन में श्रद्धा बहुत जरूरी है। श्रद्धा से ही ज्ञान टिकता है। 2. बुद्धिमान व्यक्ति ज्ञान और कर्म को एक ही मानता है और यही परम सत्य है। *गीता अध्याय 5, श्लोक 4-5* मूर्ख लोग कहते हैं ज्ञान अलग है और कर्म अलग है। लेकिन ज्ञानी जानता है कि बिना कर्म के ज्ञान अधूरा है, और बिना ज्ञान के कर्म अंधा है। जैसे — गीता पढ़ना ज्ञान है, पर उसे जीवन में उतारना कर्म है। दोनों एक साथ होंगे तभी जीवन बदलेगा। इसलिए भगवान कहते हैं, ज्ञानी वही है जो जानता भी है और करता भी है। 3. हमेशा कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि बेकार रहने से कर्मवान होना उचित माना जाता है। *गीता अध्याय 3, श्लोक 8 - `नियतं कुरु कर्म त्वं`* श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं — तू अपना नियत कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना कहीं बेहतर है। शरीर भी बिना कर्म के नहीं चल सकता। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो। आपका काम ही आपकी पूजा है। जो व्यक्ति कर्म से भागता है, वह जीवन में कभी सफल नहीं होता। 4. व्यक्ति जो चाहे वो बन सकता है, लेकिन उसे लक्ष्य पर पूरे विश्वास के साथ काम करना होगा। *गीता अध्याय 6, श्लोक 5 - `उद्धरेदात्मनात्मानं` और अध्याय 17 श्रद्धा योग* मनुष्य खुद ही अपना मित्र है और खुद ही अपना शत्रु है। गीता कहती है — जैसा तुम्हारा विश्वास होगा, वैसे ही तुम बन जाओगे। `श्रद्धामयोऽयं पुरुषः`। अगर लक्ष्य पर 100% विश्वास है और उसी दिशा में लगातार कर्म है, तो असंभव भी संभव हो जाता है। अर्जुन ने महाभारत इसलिए जीती क्योंकि उसे कृष्ण पर और अपने लक्ष्य पर अटूट विश्वास था। *सार में —* गीता हमें सिखाती है: - शंका छोड़ो, श्रद्धा रखो - ज्ञान को कर्म में बदलो - हर पल कर्म करते रहो - अपने लक्ष्य पर अटूट विश्वास रखो जो इन चार बातों को जीवन में उतार लेता है, उसका जीवन सच में सफल हो जाता है। *॥ जय श्री कृष्ण ॥*

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