
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
146 days ago
श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन करते हुए अर्जुन विस्मय और भक्ति से भर जाते हैं। ग्यारहवें अध्याय का सोलहवाँ श्लोक भगवान के उस अनंत विस्तार का वर्णन करता है जिसका न कोई आदि है और न अंत। श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 11, श्लोक 16 पश्यमि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपं नन्तबाहुदरवक्त्रनेत्रम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥ शब्दार्थ एवं व्याख्या * सर्वतोऽनन्तरूपं: मैं आपको सब ओर से अनंत रूपों वाला देख रहा हूँ। * अनन्तबाहुदरवक्त्रनेत्रम्: आपकी अनगिनत भुजाएँ, उदर (पेट), मुख और नेत्र हैं। * नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं: हे विश्वेश्वर! मैं आपका न अंत देख पा रहा हूँ, न मध्य और न ही आदि (आरंभ)। * विश्वरूप: क्योंकि आप स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड (विश्वरूप) हैं। भावार्थ अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं— "हे संपूर्ण जगत के स्वामी! हे विश्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेक हाथ, पेट, मुख और आँखें देख रहा हूँ, जो सब ओर फैले हुए हैं। आपके इस विस्तार का न तो मुझे कहीं अंत दिखाई दे रहा है, न मध्य और न ही कोई आरंभ। आप अनंत हैं।" आज का चिंतन जब हम अहंकार में होते हैं, तो हमें लगता है कि सब कुछ हमारे इर्द-गिर्द घूम रहा है। लेकिन यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम उस अनंत सत्ता के एक अत्यंत सूक्ष्म अंश हैं। भगवान का न कोई प्रारंभ है और न अंत; वे समय और स्थान (Space and Time) की सीमाओं से परे हैं। जब मनुष्य इस 'विश्वरूप' की विशालता को समझ लेता है, तो उसका अहंकार स्वतः ही भक्ति में बदल जाता है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
