
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
116 days ago
7.5.2026 दो व्यक्ति किसी बारात में गए। वहां उन दोनों को एक जैसी सुविधाएं मिली। एक व्यक्ति ने उन सुविधाओं को देखकर उनमें दोष निकालना आरंभ किया। *"स्थान अच्छा नहीं है। साफ सफाई कम है। गर्मी लगती है। एयर कंडीशन की सुविधा नहीं है। रात को केवल पंखे की हवा में सोना पड़ रहा है। भोजन भी सामान्य है, कोई अच्छे स्तर का नहीं है। अच्छी बढ़िया स्तर की मिठाइयां नहीं खिलाई इत्यादि।"* दूसरा व्यक्ति उन्हीं सुविधाओं में रहते हुए ऐसा सोचता है, कि *"काम चलाऊ सफाई ठीक है। एयर कंडीशन की सुविधा यहां भले ही न हो, लेकिन पंखा अच्छा बढ़िया है। अच्छी हवा दे रहा है। गर्मी नहीं लग रही। मच्छर भी नहीं काट रहे। मिठाइयां भी भले ही मध्यम स्तर की हैं, फिर भी काम चलाऊ ठीक हैं। भोजन भी साफ सुथरा है। कुल मिलाकर व्यवस्था ठीक है।"* अब आप देखिए पहला व्यक्ति उन्हीं सुविधाओं में दुखी है, परेशान है। उसे हर जगह दोष और कमियां ही दिख रही हैं। *"दूसरा व्यक्ति उन्हीं सुविधाओं में रहते हुए बहुत प्रसन्न है। उसे हर चीज से संतोष है। इस कारण से वह सुखी है।"* कहने का सार यह है, कि सबके लिए संसार वही है। कोई व्यक्ति संसार की वस्तुओं को देखकर सदा कमियां ही निकालता रहता है, और जीवन भर दुखी रहता है। *"दूसरा व्यक्ति बुद्धिमत्ता से विचार करता है। और जैसी जितनी सुविधाएं मिलती हैं उतने में प्रसन्न रहता है। और आनंद से जीवन जीता है।"* अब आप अपना हिसाब देखिए। आप दो में से कौन से व्यक्ति हैं? *"यदि आप पहले प्रकार के व्यक्ति हैं, तो आप भी पूरा जीवन दुखी रहेंगे। यदि इन दुखों से छूटना हो, बचना हो, तो दूसरे व्यक्ति के तुल्य अपना विचार चिंतन बनाएं।"* ऐसा सोचें *"जो मिला, जितना मिला जैसा मिला बहुत अच्छा है।"* आप सुखी रहेंगे। जो नहीं मिला उसके बारे में सोचें *"कोई बात नहीं. इसके बिना भी हम बहुत अच्छी तरह से जी सकते हैं"*. यह सकारात्मक चिंतन है। इसको अपनाएं और सुखपूर्वक जीवन जिएं। *"100% संतोष यहां संसार में किसी को भी न आज तक मिला, और न आगे मिलेगा।क्योंकि सांसारिक जड़ चेतन पदार्थों में आत्मा की इच्छाओं को 100% शांत करने का सामर्थ्य ही नहीं है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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