
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
145 days ago
इंद्रियों के सुख और सांसारिक वस्तुओं की जो 'तृष्णा' (अतृप्त इच्छा) है, वह अग्नि में घी के समान है—जितना इसे भोगो, यह उतनी ही बढ़ती जाती है। इसे समझने के लिए कुछ गहरे दृष्टिकोण यहाँ दिए गए हैं: * विवेक का उदय: संसार की चमक-धमक में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि क्या स्थायी है और क्या क्षणभंगुर। गुरु अपने ज्ञान से हमारे भीतर 'विवेक' जाग्रत करते हैं, जिससे हमें सही और गलत का अंतर समझ आने लगता है। * आंतरिक संतोष: जब तक मन बाहर खुशियाँ ढूँढता है, वह कभी शांत नहीं होता। गुरु की कृपा हमें अंतर्मुखी बनाती है, जिससे हमें अपने भीतर ही उस आनंद का अनुभव होने लगता है जिसके सामने सांसारिक भोग फीके पड़ जाते हैं। * मोह का बंधन काटना: मोह और आसक्ति ही तृष्णा की जड़ हैं। गुरु का मार्गदर्शन एक शस्त्र की तरह काम करता है जो अज्ञानता के इन बंधनों को काट देता है। आज का विचार: > "जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है, वैसे ही गुरु की कृपा प्राप्त होते ही मन के विकार और तृष्णा शांत होने लगते हैं।" > इसीलिए कहा गया है कि गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो हमें माया के जाल से मुक्त कर वास्तविक शांति की ओर ले जाते हैं।

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