
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
43 days ago
18.7.2026 यदि व्यक्ति में आत्मविश्वास हो अर्थात अपने ऊपर भरोसा हो कि *"ईश्वर की कृपा से मुझ में इतनी कला अथवा योग्यता है, मैं यह काम कर सकता हूं।"* दूसरी बात -- *"व्यक्ति अपने कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए पूरा पुरुषार्थ करे।"* और तीसरी बात -- उसको ईश्वर के प्रति श्रद्धा भी होनी चाहिए, कि *"मैं जो कर्म करूंगा, ईश्वर न्याय पूर्वक मुझे उसका उचित फल अवश्य देगा। अथवा समाज के लोगों को प्रेरित करेगा कि तुम इसे ठीक-ठीक फल दो।" "यदि किसी व्यक्ति में ये तीन विशेषताएं हों, तो उसे निश्चित ही अपने कार्य में सफलता मिलेगी।"* कभी कभी तो ऐसा भी होता है, कि *"जो कार्य करना उसे असंभव लगता था, अनेक बार तो वह असंभव जैसा लगने वाला कार्य भी संभव हो जाता है।"* वास्तव में वह कार्य असंभव नहीं था। यदि असंभव होता, तो संभव नहीं हो पाता। *"वास्तव में उस व्यक्ति की सोच कमजोर थी। वह कार्य संभव तो था ही, परंतु उस संभव कार्य को वह अपने लिए असंभव मानता था, कि "मैं तो इस कार्य को नहीं कर सकता।" जबकि ईश्वर की कृपा और उसके पुरुषार्थ आदि से वह कार्य सिद्ध हो गया। यदि वह कार्य सिद्ध हो गया, तब उसे असंभव नहीं कहना चाहिए।"* असंभव कार्य तो वह होता है *"जिस कार्य को तीनों कालों में कोई भी न कर सके।"* *"यदि आप में भी ऊपर बताई तीन बातें हों, तो आप भी असंभव जैसे दिखने वाले अनेक कार्यों को संभव कर सकते हैं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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