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22.12.2025 संसार में देखा जाता है कि *"गुण सदा सुख देते हैं, और दोष सदा दुख देते हैं, स्वयं को भी और दूसरों को भी।"* इसलिए दोषों से सदा बचना चाहिए। *"प्रतिदिन अपना आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। अपने दोषों को ढूंढ ढूंढ कर दूर करना चाहिए।"* *"ऐसे ही यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपको आपका दोष बता दे, तो उसकी बात को भी पूरे ध्यान से सुनना चाहिए। सुनकर फिर निष्पक्ष भाव से अपना निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए।" "यदि आपको ऐसा अनुभव हो, कि मुझ में यह दोष वास्तव में है, तो उसे दूर अवश्य करना चाहिए।"* कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि *"कोई व्यक्ति आपके दोषों को बढ़ा चढ़ा कर बता देता है।"* तब भी उससे दुखी न हों। उसकी बात को पूरे ध्यान से सुनें। फिर निष्पक्ष भाव से विचार करें। हो सकता है, कि *"आपके अंदर वह दोष 20% हो 30% हो। जितना भी हो, उसको स्वीकार करें, और उसे दूर अवश्य करें।" "इसका लाभ यह होगा कि उस दोष को दूर करने से आपका दुख भी कम हो जाएगा और दूसरों का भी दुख दूर हो जाएगा।"* निरीक्षण परीक्षण करने के बाद भी यदि आपको ऐसा अनुभव हो, कि *"जो दोष मुझ पर लगाया गया है, वह मुझ में है ही नहीं। इस व्यक्ति ने भ्रांति से या जानबूझ कर मुझ पर यह झूठा आरोप लगा दिया है।" "तब भी दुखी/परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जब आप में वह दोष है ही नहीं, तो फिर चिंता किस बात की? फिर दुखी क्यों होना?"* *"आप पर झूठा आरोप लगाकर गलती की दूसरे व्यक्ति ने। आपने तो कोई गलती की नहीं। तो आप क्यों दुखी हो रहे हैं? आप तो ऐसे सोचिए, कि "गलती करे कोई दूसरा व्यक्ति। और दुखी होऊं मैं। यह तो कोई बुद्धिमत्ता की बात नहीं है। जब मैंने कोई गलती की ही नहीं, तो मैं क्यों दुखी होऊं?"* इसलिए बुद्धिमान बनें, और दुखी न हों। अतः ऐसा सोचें, *"यदि आप पर लगाया गया दोष आप में है, तो उसे दूर करें, दुखी क्यों होना? और यदि दोष है ही नहीं, तो भी दुखी क्यों होना?"* हां, अधिक से अधिक आप इतना कर सकते हैं, कि *"जिसने आप पर झूठा आरोप लगा दिया, कभी अच्छा अवसर देखकर उसको आप अपना स्पष्टीकरण सुना देवें, उसे बता देवें, कि "शायद आपको भ्रांति हो गई है, आपने जो दोष मुझ में बताया था, वास्तव में इस प्रकार का दोष मुझ में है नहीं।"* इतना स्पष्टीकरण करने से आपका कर्तव्य पूरा हो जाता है। इस के बाद, *"आपके स्पष्टीकरण को वह व्यक्ति स्वीकार करे, या न करे, अब यह उसकी समस्या है। आप तो निश्चिंत हो जाएं और प्रसन्न रहें।"* यदि उसने झूठा आरोप लगाया है, तो 'उसे' दुखी होना चाहिए, क्योंकि ग़लती उसने की है। और *"यदि वह अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता, उसका दंड नहीं भोगता, उसका प्रायश्चित नहीं करता, तब आप उस घटना को ईश्वर के न्याय पर छोड़ दें। उसका न्याय फिर अंत में ईश्वर ही कर लेगा। आप तो प्रसन्न रहें। उसकी कोई चिंता न करें।"*

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