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SHREE SHARMA

124 days ago

तुलसीदास जी द्वारा रचित 'हनुमान बाहुक' की उत्पत्ति के पीछे एक बहुत ही मार्मिक और अटूट श्रद्धा की कहानी है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि शारीरिक पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए एक भक्त की पुकार है। कहा जाता है कि अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, जब गोस्वामी तुलसीदास जी काशी (वाराणसी) में रह रहे थे, तब वे कलियुग के प्रकोप के कारण भयंकर शारीरिक व्याधि से घिर गए थे। उनके दाहिने हाथ (भुजा) में अत्यंत तीव्र दर्द और फोड़े-फुंसियां हो गई थीं। तुलसीदास जी का वह दर्द इतना बढ़ गया था कि उन्हें रात-दिन नींद नहीं आती थी। वे न तो लिख पा रहे थे और न ही ठीक से बैठ पा रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने कई औषधियों का प्रयोग किया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। विद्वानों का मानना है कि यह पीड़ा उनके प्रारब्ध या कलियुग के प्रभाव के रूप में आई थी। जब शारीरिक पीड़ा सहनशक्ति से बाहर हो गई, तब तुलसीदास जी ने अपने इष्ट देव और रक्षक हनुमान जी का स्मरण किया। वे जानते थे कि हनुमान जी 'संकटमोचन' हैं और भक्तों के शारीरिक और मानसिक दुखों को हरने वाले हैं। इसी असहनीय पीड़ा की स्थिति में तुलसीदास जी ने हनुमान जी की स्तुति में 44 पदों की रचना की। उन्होंने इन पदों में हनुमान जी के बल, बुद्धि और पराक्रम का वर्णन किया और उनसे अपनी भुजा (बाहु) की पीड़ा को हरने की विनती की। चूँकि यह रचना विशेष रूप से बाहु (भुजा) की पीड़ा के निवारण के लिए की गई थी, इसीलिए इसका नाम 'हनुमान बाहुक' पड़ा। मान्यता है कि जैसे ही तुलसीदास जी ने इस स्तुति को पूर्ण किया, उनकी भुजा का दर्द धीरे-धीरे समाप्त हो गया और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए। हनुमान जी की कृपा से उनके शरीर के सभी घाव भर गए। आज भी हिंदू धर्म में हनुमान बाहुक का पाठ अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। लोग इसका पाठ मुख्य रूप से इन कारणों से करते हैं: शारीरिक रोगों से मुक्ति: विशेषकर वात रोग, गठिया या शरीर के किसी भी हिस्से में होने वाले पुराने दर्द के लिए। नकारात्मक ऊर्जा से बचाव: ऊपरी बाधाओं या कलियुग के दुष्प्रभावों को शांत करने के लिए। अखंड विश्वास: यह सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति में हर दुख को काटने की शक्ति होती है।

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