
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
82 days ago
*💖गणेश जी और तुलसी जी की कहानी* *एक बार की बात है, भगवान गणेश गंगा नदी के किनारे गहरे ध्यान में बैठे थे। वे पीतांबर वस्त्र धारण किए हुए थे और उनके मुख पर एक दिव्य तेज चमक रहा था।* *उसी समय, राजा धर्मात्मज की पुत्री तुलसी अपनी शादी की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर निकली थीं। गंगा किनारे से गुजरते हुए उनकी नजर ध्यानमग्न गणेश जी पर पड़ी। गणेश जी के दिव्य और आकर्षक रूप को देखकर तुलसी जी उन पर मोहित हो गईं।* *तुलसी जी ने गणेश जी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह की बात सुनकर गणेश जी ने अपना ध्यान खोला और बड़े ही शांत भाव से कहा, "हे देवी! मैं एक ब्रह्मचारी हूँ और मेरा विवाह करने का कोई विचार नहीं है। इसलिए मैं आपका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।"* *गणेश जी के इस इंकार से तुलसी जी को बहुत गुस्सा आ गया। क्रोध में आकर उन्होंने गणेश जी को श्राप दे दिया कि, "तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तुम्हारे एक नहीं, बल्कि दो-दो विवाह होंगे।"* *यह सुनकर गणेश जी को भी क्रोध आ गया और उन्होंने तुलसी जी को पलटकर श्राप दिया, "तुमने बिना कारण मुझे श्राप दिया है, इसलिए तुम्हारा विवाह एक असुर (राक्षस) से होगा। उसके बाद तुम एक पौधे का रूप ले लोगी।"* *गणेश जी का श्राप सुनकर तुलसी जी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने तुरंत गणेश जी से माफी मांगी और अपना श्राप वापस लेने की प्रार्थना की।* *तुलसी जी को पछताते देख गणेश जी का गुस्सा शांत हुआ। उन्होंने कहा, "मेरा श्राप पूरी तरह खाली तो नहीं जा सकता, तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण नाम के असुर से ही होगा। लेकिन इसके बाद तुम भगवान विष्णु की प्रिय बनोगी। कलयुग में तुम 'तुलसी' के पौधे के रूप में पूजी जाओगी और तुम्हारे बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाएगी।"* *गणेश जी ने आगे कहा, "चूंकि तुमने मेरे ध्यान में विघ्न डाला था, इसलिए मेरी पूजा में कभी भी तुलसी के पत्तों का उपयोग नहीं किया जाएगा। जो भी मुझे तुलसी चढ़ाएगा, उसकी पूजा सफल नहीं होगी।"* *((सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी क्रोध में आकर बिना सोचे-समझे कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए और न ही किसी को अपशब्द या श्राप देना चाहिए। क्रोध हमेशा नुकसान ही पहुंचाता है।))*

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