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SHREE SHARMA

93 days ago

एक समय की बात है, एक कृष्ण-भक्त महात्मा अपनी छोटी सी कुटिया में अकेले रहते थे। उनकी भक्ति ऐसी थी कि वे हर वस्तु में अपने 'लल्ला' (श्री कृष्ण) के ही दर्शन करते थे। उनके पास संपत्ति के नाम पर केवल एक कान्हा की प्रतिमा और ठाकुर जी के भोग के लिए थोडा सा माखन-मिश्री रहता था। एक रात एक चोर उनकी कुटिया में इस उम्मीद से घुसा कि शायद कोई कीमती बर्तन या साधु की जमापूँजी मिल जाए। महात्मा उस समय जाग रहे थे, पर उन्होंने आंखें नहीं खोलीं। वे समझ गए कि कुटिया में कोई आया है। चोर ने अंधेरे में हाथ-पाँव मारे, पर उसे कुछ न मिला। अंत में उसे कोने में एक मिट्टी की मटकी दिखी। उसने सोचा कि इसमें शायद मुहरें होंगी। जैसे ही उसने मटकी उठाई, महात्मा ने प्रेम से पुकारा— "अरे! कन्हैया तुम आ गए?" चोर डर गया! उसे लगा कि महात्मा जाग गए हैं और अब शोर मचाएंगे। वह मटकी लेकर बाहर की तरफ भागा। मटकी में मुहरें नहीं, बल्कि ताजा माखन था। भागते समय चोर का पैर फिसला और थोड़ी सी मिश्री ज़मीन पर गिर गई। महात्मा कुटिया से बाहर निकले, पर वे लाठी लेकर नहीं, बल्कि हाथ में मिश्री की कटोरी लेकर दौड़े। वे चिल्ला रहे थे— "अरे ओ लाला! रुक तो सही! सूखा माखन गले में अटक जाएगा। यह मिश्री तो लेता जा, बिना मिश्री के माखन में स्वाद नहीं आएगा। तूने तो आधी रात को आने का नियम ही बना लिया है!" चोर चकित रह गया। वह भागता रहा और महात्मा उसके पीछे भागते रहे। अंत में चोर एक पेड़ के नीचे थककर रुक गया। महात्मा उसके पास पहुँचे, हाफते हुए उसकी हथेली में मिश्री रखी और बोले: "मेरे कान्हा, तू चोरी क्यों करता है? जो तेरा है, उसे माँग लिया कर। आज तूने माखन खाया, तो मेरा हृदय तृप्त हो गया, पर तू भाग क्यों रहा था?" चोर ने जब महात्मा की आँखों में देखा, तो उसे वहाँ डांट या नफरत नहीं, बल्कि एक अगाध प्रेम दिखा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने महात्मा के पैर पकड़ लिए और बोला, "महाराज, मैं भगवान नहीं, मैं तो एक नीच चोर हूँ। मैं तो आपकी मटकी चुराने आया था।" महात्मा मुस्कुराए और बोले, "चोरी तो मेरा कृष्ण भी करता था। पर वह माखन के साथ-साथ लोगों के 'मन' भी चुरा लेता था। तूने आज मेरा माखन चुराया है, तो चल आज से एक काम कर— तू चोरी तो कर, पर अब केवल नाम की चोरी कर।" चोर ने पूछा, "महाराज, नाम की चोरी कैसे होती है?" महात्मा ने कहा: "जैसे तू छिपकर दूसरों के घर घुसता है, वैसे ही अब तू एकांत में बैठकर छिपकर 'गोविंद' के नाम को अपने हृदय में बसा। दुनिया को पता भी न चले और तू प्रभु के नाम का खजाना लूट ले। याद रख, जब तू अगली बार चोरी करने जाए, तो बस यह ध्यान रखना कि तेरा कन्हैया तुझे देख रहा है। यदि उसके सामने तू चोरी कर सके, तो शौक से करना।" वह चोर उस दिन से बदल गया। उसने चोरी तो नहीं छोड़ी, पर अब वह 'नाम-संकीर्तन' की चोरी करने लगा। उसने जान लिया कि यदि ईश्वर हमारे साथ है, तो बुराई के लिए हमारे जीवन में कोई स्थान ही नहीं बचता। भक्त के लिए चोर भी भगवान का ही रूप है। यह महसूस करना कि "प्रभु देख रहे हैं", इंसान को गलत रास्ते पर जाने से रोक देता है। कृष्ण भक्ति की यह धारा हमें सिखाती है कि किसी को अपराधी मानकर त्यागने से बेहतर है, उसे प्रेम देकर सुधार देना।

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Comments (2)

बरखा शर्मा

बरखा शर्मा

May 29, 2026

RADHE RADHE JI SHUBH RATRI JI🙏✨🌹