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जय श्री राधे कृष्णा! 🙏✨ सच तो यह है कि परमात्मा भाव के भूखे हैं, दिखावे के नहीं। सच्चा प्रेम और भक्ति भगवान कृष्ण ने स्वयं श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि वे केवल प्रेम के वशीभूत हैं। उनके लिए छप्पन भोग और सोने के महल उतने मायने नहीं रखते, जितना एक भक्त का निश्छल मन। * विदुरानी के साग: दुर्योधन के राजसी मेवों को त्याग कर प्रभु ने विदुरानी के साधारण बथुए का साग चाव से खाया, क्योंकि उसमें प्रेम था। * शबरी के बेर: मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने शबरी के जूठे बेर सिर्फ इसलिए खाए क्योंकि वह उन्हें चख-चख कर केवल मीठे फल दे रही थी। * बुढ़ी माई का भाव: जिस तरह एक माँ अपने बच्चे को बिना किसी शर्त के चाहती है, वैसी ही निस्वार्थ भक्ति भगवान को सबसे प्रिय है। भक्ति का असली स्वरूप दिखावा तो संसार के लिए होता है, लेकिन रिज्वल (Rituals) या कर्मकांड अगर बिना प्रेम के किए जाएं, तो वे केवल एक प्रक्रिया मात्र रह जाते हैं। जब हृदय में सच्चा प्रेम होता है, तो: * सादगी ही सबसे बड़ा श्रृंगार बन जाती है। * आँसू सबसे पवित्र जल बन जाते हैं। * मौन सबसे गहरी प्रार्थना बन जाता है। > "मनुष्य का हृदय ही ईश्वर का असली मंदिर है।" >

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