MyMandirInstall

*हमारे मंदिरों में आरती के समय सन्नाटा क्यों होता है, लेकिन भंडारे की खबर मिलते ही भीड़ क्यों उमड़ पड़ती है ❓* 2 मिनट समय निकालकर #Thread अंत तक अवश्य पढ़े।🧵👇 🔏 लेखक : पंकज सनातनी बात थोड़ी कड़वी है, लेकिन हमें इस पर बहुत ही गंभीरता और ईमानदारी से सोचने की जरूरत है। हम अक्सर सवाल करते हैं कि हिंदू समाज एकजुट क्यों नहीं है, मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में आम हिंदू की भागीदारी कम क्यों हो रही है, और हमारी युवा पीढ़ी धर्म से दूर क्यों होती जा रही है..? लेकिन इन सवालों का जवाब बाहर खोजने से पहले हमें अपने आसपास की व्यवस्था, अपने आचरण और अपनी सोच पर नजर डालनी होगी। जब तक हम समस्या की असली जड़ को नहीं समझेंगे, तब तक केवल भीड़ जुटाने, बड़ी-बड़ी रैलियां निकालने, सोशल मीडिया पर फोटो डालने या हिंदू एकता के नारे लगाने से समाज वास्तविक रूप से एकजुट नहीं हो सकता। *◾ धर्म का असली अर्थ क्या है ?* सबसे पहले हमें धर्म के वास्तविक अर्थ को समझना होगा। धर्म केवल मंदिर जाकर माथा टेकने, नारियल चढ़ाने, प्रसाद लेने, त्योहार मनाने, लाउडस्पीकर बजाने या सोशल मीडिया पर धार्मिक संदेश साझा करने का नाम नहीं है। धर्म जीवन जीने की ऐसी व्यवस्था है जिसमें सत्य, सेवा, संस्कार, अनुशासन, करुणा, समानता, कर्तव्य और इंसानियत शामिल है। जब इन मूल भावनाओं की जगह केवल दिखावा, स्वार्थ, भेदभाव और अपनी सुविधा का धार्मिक व्यवहार लेने लगता है, तब धर्म का बाहरी स्वरूप तो बचा रहता है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। *◾ VIP दर्शन का धंधा* इसी संदर्भ में आज मंदिरों में बढ़ती VIP दर्शन की व्यवस्था पर गंभीर चर्चा जरूरी है। बुजुर्गों, दिव्यांगों या बीमारों के लिए अलग सुविधा होना समझ में आता है, लेकिन केवल पैसा, पद या पहचान के दम पर किसी को विशेष सुविधा देना कहां का न्याय है..? एक आम और गरीब हिंदू घंटों धूप, गर्मी और भीड़ में धक्के खाकर अपनी बारी का इंतजार करता है, जबकि पैसे और पहुंच वाला व्यक्ति 2 मिनट में दर्शन करके निकल जाता है। जब भगवान के दरबार में भी इंसान की औकात उसकी जेब और पहचान से तय होगी, तो सामान्य व्यक्ति के मन में यह भाव आना स्वाभाविक है कि जहां मेरे साथ भेद-भाव हो रहा है, वहां मेरे लिए क्या स्थान है..? भगवान के सामने तो राजा और रंक दोनों समान होने चाहिए। VIP कल्चर के अलावा एक और बड़ा कारण है जिस पर आज का हिंदू समाज पूरी तरह मौन है। भारत में आज लाखों हिंदू संगठन संचालित हैं, बड़े-बड़े जुलूस और रैलियां निकाली जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद हम अपने मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं करा पा रहे हैं। ज्यादातर संगठन केवल अपना बैनर बड़ा करने, सोशल मीडिया पर फोटो डालने या रैलियां निकालने तक सीमित हैं। जिस असली मुद्दे (मंदिर मुक्ति) के लिए कानूनी और मैदानी लड़ाई लड़नी चाहिए, उस पर ये संगठन समाज को एकजुट करके कोई बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा करते। जब तक कोई चुनाव या बड़ा आयोजन न हो, ये संगठन आम हिंदू के सुख-दुःख में खड़े नहीं होते। संगठनों में आपस में ही खींचतान चलती रहती है, जिसका फायदा उठाकर सरकारें बेफिक्र होकर हमारे मंदिरों को नियंत्रित करती रहती हैं। यह एक कटु सत्य है कि देश के अधिकांश लोगों को आज भी यह जानकारी नहीं है कि हिंदू मंदिरों का प्रबंधन किन कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत सरकार द्वारा किया जा रहा है। यह विषय आस्था का ही नहीं, बल्कि हमारे संवैधानिक अधिकारों का भी है। भारतीय संविधान का आर्टिकल 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और संचालन की पूरी आजादी देता है। इसी अधिकार के तहत देश में चर्च, मस्जिद, मदरसे और गुरुद्वारे पूरी तरह स्वतंत्र हैं और अपने-अपने धार्मिक परिसरों को स्वयं संचालित करते हैं। वहां सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, जिससे उनकी व्यवस्थाएं, शिक्षा और सेवा कार्य स्वतंत्र रूप से चलते हैं। लेकिन केवल हिंदू मंदिरों के लिए आर्टिकल 25(2)(b) और संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 28 (Entry 28) का सहारा लिया गया, जो सरकार को "वित्तीय और सामाजिक सुधार" के नाम पर नियम बनाने की ताकत देता है। इसी का फायदा उठाकर राज्यों में 'धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम' बनाए गए और देश के लगभग सभी प्रमुख एवं ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों पर सरकारी बोर्ड बिठाकर उनके दान, जमीन और खजाने का नियंत्रण प्रशासनिक हाथों में ले लिया गया। मंदिरों का करोड़ों रुपया सरकारी खजाने में चला जाता है, लेकिन वही पैसा वापस हिंदू समाज के कल्याण, वेद पाठशालों, बुनियादी सुविधाओं या गुरुद्वारों की तरह निष्काम लंगर चलाने में इस्तेमाल नहीं हो पाता। इस दोहरे कानून और प्रशासनिक गुलामी पर आज

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!