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SHREE SHARMA

336 days ago

(((( तत्वज्ञानी महापुरुष का गोपीभाव )))) कैसे हुई एक अद्वैत वेदांती महात्मा को गोपीभाव की प्राप्ति ? . श्री मधुसूदन सरस्वती नाम के एक अद्वैत वेदांती हुए। उनको शंकराचार्य पद मिलने वाला था। . मधुकरी मांगकर रहते थे केवल एक घर से मधुकरी मांगते। मिल जाये तो ठीक, नही मिली तो दूसरे घर मे नही जाते। . एक ब्रज की ग्वालिनि के दरवाजे पर गए। वह चूल्हे पर रोटियां बना रही थी, उसकी गोदी मे उसका बच्चा बैठकर माखन रोटी पा रहा था। . बाबा को देखकर उसने अपने बच्चे को बाजू में रखा और बाबा के पात्र मे रोटी डाली। स्वामी जी ने उसकी साड़ी पर देखा तो बालक का मल लगा हुआ था। . आंख बंद करके स्वामी जी सोचने लगे.. अरे ! इस रोटी को लौटा भी नही सकता और पा भी नही सकता। . आंख खोली तो देखा की बालकृष्ण उस गोपी के आंगन मे बैठे है और उस बालक के मुख की माखन रोटी छीनकर खा रहे है। . स्वामी जी समझ गए की यह ब्रज की गोपियां सामान्य नही है, ब्रजवासियों का भाव सामान्य नही है। . सारा तत्वज्ञान धरा रह गया, स्वामी जी वही उस गोपी के सामने रज मे लोटने लगे। निश्चय कर लिया की अब काशी लौट कर नही जाऊंगा, यही ब्रज मे गोपियों की दासी बन कर रज मे पड़ा रहूंगा। . छह महीने हो गए, स्वामी जी रोज यमुना स्नान करते, गोपियों की चरण रज माथे पर लगाते और स्वयं को गोपियों की दासी मानकर पागलों की तरह रज मे लेटे रहते। . शिष्य ढूंढते हुए वृंदावन आये। स्वामी जी से कहा.. आप जैसे तत्वज्ञानी महापुरुष, वेदांत के ज्ञाता ऐसे पागलों की तरह रज मे लेटे रहते है। आपका तत्वज्ञान कहां चला गया ? . स्वामी जी ने एक श्लोक बोला.. . वंशी विभूषित करात्, नवनीरद आभात्, पीताम्बरात्, अरुणबिंबफल अधरोष्ठात्। पूर्णेन्दु सुंदर मुखात्, अरविंद नेत्रात्, कृष्णात्, परम किम् अपि तत्वम्, अहम् न जानि।। . जिनके करकमलों में बंसी शोभायमान है, जिनके सुंदर शरीर की आभा नये बादलों जैसी घनश्याम है, जिनका सुंदर मुख पूर्ण चन्द्र जैसा है, जिनके नेत्र, कमल की भांति सुंदर है, जिन्होंने पीताम्बर धारण किया है, जिनके अधरोष्ठ उदित होते हुए सूर्य के लाल फल के रंग जैसा है, ऐसे श्रीकृष्ण भगवान के सिवा और कोई परम तत्व है, यह मैं नहीं जानता। . शिष्यों ने कहा.. शंकराचार्य पद आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। . स्वामी जी ने कहा.. मुझे अब इस पद से क्या मतलब‌ ? भगवान ने कृपा करके मुझे गोपियों के पद चरणों की दासी बना दिया। अब मै ब्रज छोड़ कर कही जाऊंगा।

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