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यह एक बहुत ही गहरा और रोमांचक सवाल है। सोमनाथ मंदिर के दक्षिण में समुद्र किनारे स्थित उस स्तंभ को 'बाण स्तंभ' (Baan Stambh) कहा जाता है। उस पर संस्कृत में लिखा है: > 'आसमुद्रान्त दक्षिणध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग' > (अर्थात: समुद्र के इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई बाधा या भूमि का टुकड़ा नहीं है।) > हजारों साल पहले बिना सैटेलाइट या आधुनिक मैप्स के यह जानकारी होना वाकई हैरान करता है। इसके पीछे के कुछ प्रमुख तर्कों को हम इस तरह समझ सकते हैं: 1. प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान (Astronomy) प्राचीन भारतीय ऋषियों और वैज्ञानिकों, जैसे आर्यभट्ट और भास्कराचार्य, को यह पता था कि पृथ्वी गोल है। उन्होंने खगोलीय गणनाओं के लिए 'अक्षांश' (Latitude) और 'देशांतर' (Longitude) की सटीक समझ विकसित कर ली थी। * वे तारों की स्थिति और छाया की लंबाई के आधार पर यह गणना कर सकते थे कि किसी विशेष देशांतर पर भूमि का विस्तार कहाँ तक है। 2. समुद्री यात्राएं और नौवहन (Navigation) भारत का समुद्री व्यापार प्राचीन काल से ही बहुत उन्नत था। भारतीय नाविक चोल साम्राज्य और उससे भी पहले से इंडोनेशिया, जावा और सुमात्रा तक यात्रा करते थे। * यह संभव है कि नाविकों और खोजकर्ताओं ने दक्षिण की ओर लंबी यात्राएं की हों और उनके अनुभवों को विद्वानों ने संकलित किया हो। 3. गणना का केंद्र (Geographical Mapping) प्राचीन भारत में उज्जैन को 'शून्य रेखा' (Prime Meridian) माना जाता था। सोमनाथ और उज्जैन के बीच एक विशेष भौगोलिक संबंध है। * विद्वानों का मानना है कि उस समय के भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रूप से ऐसे बिंदुओं को चिह्नित किया था जहाँ से जल और थल की सीमाओं का सटीक ज्ञान हो सके। 4. मौखिक परंपरा और ग्रंथों का ज्ञान भारत में ज्ञान 'श्रुति' और 'स्मृति' के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता था। वराहमिहिर जैसे वैज्ञानिकों ने अपने ग्रंथों में भूगोल और अंतरिक्ष के जो विवरण दिए हैं, वे आज के विज्ञान के काफी करीब मिलते हैं। एक रोचक तथ्य: अगर आप आज के 'गूगल मैप' पर भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण की ओर एक सीधी रेखा खींचेंगे, तो वह रेखा बिना किसी द्वीप या महाद्वीप को छुए सीधे अंटार्कटिका (दक्षिण ध्रुव) पर जाकर रुकती है। यह हमारे पूर्वजों के अविश्वसनीय 'मैपिंग' कौशल का प्रमाण है।

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