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सुदामा के साथ बातें करते-करते कब कृष्ण उनके पाँव दबाने लगे, सुदामा को पता ही नहीं चला। बातों-बातों में सुदामा सो चुके थे, किंतु कृष्ण अपनी ही स्मृतियों में डूबे उनके पाँव दबाते हुए बालपन की बातें करते जा रहे थे। उसी क्षण रुक्मिणी ने आकर उनके कंधे पर हाथ रखा। कृष्ण चौंके—पहले रुक्मिणी को देखा, फिर सुदामा की ओर दृष्टि गई। क्षण भर में सब समझकर वे वहाँ से उठे और अपने कक्ष में चले आए। कृष्ण की उस असामान्य मग्न अवस्था को देखकर रुक्मिणी ने विनम्रता से पूछा— “स्वामी, आज आपका व्यवहार कुछ विचित्र प्रतीत हो रहा है। आप, जो संसार के सबसे बड़े सम्राटों के द्वारका आगमन पर भी तनिक विचलित नहीं होते, अपने मित्र के आगमन का समाचार पाते ही भोजन छोड़ नंगे पाँव उन्हें लेने दौड़ पड़े। आप, जिन्हें कोई दुःख, कष्ट या चुनौती कभी रुला न सकी— यहाँ तक कि गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु देखकर भी जो नहीं रोए— वही आप, अपने मित्र के जीर्ण-शीर्ण, घावों से भरे पाँव देखकर अपने अश्रुओं से उन्हें धोने लगे। कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, मित्र को देखकर इतने भावविभोर हो गए कि बिना कुछ सोचे उसे त्रिलोक की समस्त समृद्धि देने को तत्पर हो उठे।” कृष्ण उसी भावविह्वल स्वर में बोले— “वह मेरा बालपन का मित्र है, रुक्मिणी।” तभी सत्यभामा ने भी जिज्ञासा प्रकट की— “परंतु स्वामी, उसने तो गुरुमाता द्वारा बाँटकर खाने को दिए गए चने आपसे छुपाकर स्वयं खा लिए थे। फिर ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों?” कृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले— “सत्यभामा, सुदामा ने ऐसा कार्य किया है कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए। उसने वे चने भूख के कारण नहीं खाए थे, बल्कि इसलिए खाए थे क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे। उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़ गए थे, और यह भी कि वे एक ब्राह्मणी के घर से चुराए गए थे। उस ब्राह्मणी का श्राप था कि जो भी उन चनों को खाएगा, वह जीवन-पर्यंत दरिद्र रहेगा। सुदामा ने वे चने मुझसे छुपाकर इसलिए खाए ताकि मैं सुखी रहूँ। वह मुझे ईश्वर का अंश मानता था— और उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो गया तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जाएगी। इसलिए उसने सृष्टि के कल्याण हेतु स्वयं दरिद्र होना स्वीकार कर लिया।” “इतना बड़ा त्याग…!” रुक्मिणी के मुख से अनायास निकल पड़ा। कृष्ण गंभीर स्वर में बोले— “मेरा मित्र ब्राह्मण है, रुक्मिणी। ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी होते हैं, उनके हृदय में जनकल्याण की भावना भरी होती है। अपवादों को छोड़ दें तो वे ऐसे ही होते हैं। अब बताओ, ऐसे मित्र के लिए हृदय में प्रेम नहीं तो और क्या उत्पन्न होगा, प्रिये? मैं गोकुल छोड़ते समय इसलिए नहीं रोया था क्योंकि यदि मैं रोता तो मेरी मैया प्राण ही त्याग देतीं। परंतु अपने मित्र के उन घावों से भरे पाँव देखकर मेरा हृदय भर आया। उसके पाँवों के घाव और जीवन की दरिद्रता सिर्फ इसलिए थी क्योंकि वह अपने मित्र का भला चाहता था। रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने इस कृष्ण का इतना भला कभी नहीं चाहा। लोग मुझसे अपने सुख की अपेक्षा रखते हैं, पर सुदामा जैसे मित्र अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से कष्ट और दरिद्रता ओढ़ लेते हैं। ऐसे मित्र अत्यंत दुर्लभ होते हैं— और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए, तो भी वह कम ही होगी।” कक्ष के भीतर सभी रानियों के नेत्र सजल थे— और कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा-यमुना अविरल बह रही थीं। आभार : जयंत कश्मीरी

Comments (2)

Pannalal Chouhan

Pannalal Chouhan

Jan 3, 2026

राम राम

R k jangid 

phulera Jaipur

R k jangid phulera Jaipur

Jan 3, 2026

जय श्री कृष्णा🙏