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भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर ओडिशा के सबसे प्राचीन और भव्य मंदिरों में से एक है। यहाँ की महाशिवरात्रि (जिसे स्थानीय लोग 'जागर' भी कहते हैं) का अनुभव बेहद खास और आध्यात्मिक रूप से जीवंत होता है। यहाँ लिंगराज मंदिर की शिवरात्रि से जुड़ी प्रमुख बातें दी गई हैं: 1. हरि-हर का मिलन लिंगराज मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान शिव की पूजा 'हरि-हर' के रूप में की जाती है। 'हरि' यानी भगवान विष्णु और 'हर' यानी भगवान शिव। शिवरात्रि के दिन इन दोनों स्वरूपों की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व है, जो धार्मिक समन्वय का प्रतीक है। 2. महादीपा (Mahadipa) की परंपरा शिवरात्रि के उत्सव का सबसे मुख्य आकर्षण मंदिर के शिखर पर 'महादीपा' (विशाल दीप) का उठाया जाना है। * हजारों भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और मंदिर परिसर में इस दीप के दर्शन का इंतजार करते हैं। * जैसे ही मंदिर के सेवक (सेवायत) मंदिर के गुंबद पर चढ़कर महादीपा जलाते हैं, भक्त अपना उपवास खोलते हैं। यह दृश्य अत्यंत भक्तिमय होता है। 3. अनुष्ठान और उत्सव * अभिषेक: शिवरात्रि के दिन लिंगम का जल, दूध और पंचामृत से निरंतर अभिषेक किया जाता है। * सजावट: पूरे मंदिर को फूलों और रंग-बिरंगी रोशनी से भव्य तरीके से सजाया जाता है। * भजन और कीर्तन: रात भर मंदिर परिसर शिव के जयकारों और पारंपरिक भजनों से गूँजता रहता है। 4. भक्तों का जनसैलाब ओडिशा के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु भुवनेश्वर पहुँचते हैं। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन द्वारा विशेष इंतजाम किए जाते हैं, फिर भी भक्तों का उत्साह देखने लायक होता है। मंदिर के बाहर का मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस दिन की रौनक और बढ़ा देते हैं। > एक रोचक तथ्य: लिंगराज मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक) की भी पूजा की जाती है, जो इस मंदिर को अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती है।

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