
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
104 days ago
भृंगी की अनन्य और हठी भक्ति: शिवगणों में नंदी की तरह ही भृंगी भी महादेव के एक महान भक्त और ऋषि थे। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्होंने वरदान पाया था कि वे जब चाहें कैलाश पर महादेव के सानिध्य में रह सकते हैं। इसके बाद वे कैलाश पर ही रहने लगे। भृंगी की भक्ति बहुत गहरी थी, लेकिन उनकी भक्ति में एक हठ और अज्ञानता भी थी। वे केवल भगवान शिव की ही पूजा करते थे और माता पार्वती की पूजा या परिक्रमा नहीं करते थे, जबकि नंदी और अन्य गणों ने उन्हें कई बार समझाया था कि शिव-शक्ति की पूजा एक साथ ही पूर्ण होती है। परिक्रमा का विवाद और अर्धनारीश्वर रूप: एक बार भृंगी महादेव की आराधना करने पहुंचे। उस समय माता पार्वती भगवान शिव की बाईं गोद में विराजमान थीं। भृंगी ने केवल शिव जी की पूजा की और फिर उनकी परिक्रमा करनी चाही। वे ब्रह्मचारी थे और माता पार्वती की परिक्रमा नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने माता से कुछ देर के लिए शिव जी से अलग होने का अनुरोध किया। माता पार्वती के मना करने पर भृंगी अपने हठ पर अड़ गए। उन्होंने एक सर्प का रूप धारण किया और दोनों के बीच से निकलकर परिक्रमा करने का प्रयास किया। भृंगी की इस अज्ञानता को दूर करने के लिए भगवान शिव ने तत्काल माता पार्वती को स्वयं में विलीन कर लिया और देवताओं के लिए भी दुर्लभ 'अर्धनारीश्वर' रूप धारण कर लिया। भृंगी का दुस्साहस और माता पार्वती का श्राप: अर्धनारीश्वर रूप देखने के बाद भी भृंगी का हठ कम नहीं हुआ। उन्होंने एक चूहे का रूप धारण किया और शिव-शक्ति को बीच से कुतर कर अलग करने का दुस्साहस करने लगे। इस धृष्टता को देखकर माता पार्वती को अत्यंत क्रोध आ गया। उन्होंने श्राप दिया कि यदि भृंगी की दृष्टि में स्त्री शक्ति का कोई सम्मान नहीं है, तो उनके शरीर से उनकी माता का अंश अलग हो जाए। सृष्टि के नियम के अनुसार मनुष्य को हड्डियां पिता से और रक्त व मांस माता से मिलता है। श्राप के प्रभाव से भृंगी के शरीर का मांस और रक्त तुरंत अलग हो गया और वे केवल हड्डियों का एक ढांचा मात्र रह गए। ज्ञान की प्राप्ति और तीसरा पैर: इस असहनीय पीड़ा के बाद भृंगी को सत्य का ज्ञान हुआ कि पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने उसी अवस्था में माता पार्वती और शिव जी से क्षमा मांगी। जब माता पार्वती श्राप वापस लेने लगीं, तो भृंगी ने उन्हें रोक दिया और कहा कि वे इसी रूप में रहना चाहते हैं ताकि संसार उन्हें देखकर यह सीख सके कि नारी के बिना पुरुष अधूरा है। उनकी इस बात से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सदैव अपने साथ रहने का वरदान दिया। चूंकि भृंगी के शरीर में मांस-रक्त नहीं था, इसलिए उनका भार संभालने के लिए महादेव ने उन्हें एक तीसरा पैर प्रदान किया। इसी कारण भृंगी को तीन पैरों वाला गण कहा जाता है। कथा की सीख और परंपराएं: शिव जी की आधी परिक्रमा: भृंगी उस समय महादेव की आधी ही परिक्रमा कर पाए थे, इसी कारण आज भी केवल भोलेनाथ की ही आधी परिक्रमा करने का विधान है। अर्धनारीश्वर का संदेश: यह रूप सिखाता है कि शिव और शक्ति एक ही हैं। अर्धनारीश्वर रूप में माता पार्वती का वाम (बाईं) अंग में होना यह दर्शाता है कि सृष्टि में स्त्री का स्थान पुरुष से पहले और उच्च है। राधे राधे

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